अंग: 606
सोरठि महला ४ ॥ आपे स्रिसटि उपाइदा पिआरा करि सूरजु चंदु चानाणु ॥ आपि निताणिआ ताणु है पिआरा आपि निमाणिआ माणु ॥ आपि दइआ करि रखदा पिआरा आपे सुघड़ु सुजाणु ॥१॥ मेरे मन जपि राम नामु नीसाणु ॥ सतसंगति मिलि धिआइ तू हरि हरि बहुड़ि न आवण जाणु ॥ रहाउ ॥ आपे ही गुण वरतदा पिआरा आपे ही परवाणु ॥ आपे बखस कराइदा पिआरा आपे सचु नीसाणु ॥ आपे हुकमि वरतदा पिआरा आपे ही फुरमाणु ॥२॥ आपे भगति भंडार है पिआरा आपे देवै दाणु ॥ आपे सेव कराइदा पिआरा आपि दिवावै माणु ॥ आपे ताड़ी लाइदा पिआरा आपे गुणी निधानु ॥३॥ आपे वडा आपि है पिआरा आपे ही परधाणु ॥ आपे कीमति पाइदा पिआरा आपे तुलु परवाणु ॥ आपे अतुलु तुलाइदा पिआरा जन नानक सद कुरबाणु ॥४॥५॥
अर्थ: हे भाई! वह प्यारा प्रभू आप ही सृष्टि की रचना करता है, और (संसार को) रोशन करने के लिए सूरज व् चंदर बनाता है। प्रभू आप ही बेसहारों का सहारा है, जिस को कोई आदर मान नहीं देता उनको वह आदर मान देने वाला है। वह प्यारा प्रभू सुंदर आत्मिक बनावट वाला है, सब के दिलों की जानने वाला है, वह कृपा कर के सब की रक्षा करता है ॥१॥ हे मेरे मन! परमात्मा का नाम सुमिरन किया कर। (नाम ही जीवन-सफ़र के लिए) राहदारी है। हे भाई! साध संगत में मिल कर तूँ परमात्मा का ध्यान धरा कर, (ध्यान की बरकत से) फिर जन्म मरण का चक्र नहीं रहेगा ॥ रहाउ ॥ हे भाई! वह प्यारा प्रभू आप ही (जीवों को अपनें) गुणों की सौगात देता है, आप ही जीवों को अपनी हजूरी में कबूल करता है। प्रभू आप ही सब ऊपर कृपा करता है, वह आप ही (जीवों के लिए) सदा कायम रहने वाली प्रकाश की मीनार है। वह प्यारा प्रभू आप ही (जीवों को) हुकम में चलाता है, आप ही हर जगह हुकम करता है ॥२॥ हे भाई! वह प्यारा प्रभू (अपनी) भगती के खजानों वाला है, आप ही (जीवों को अपनी भगती की) दात देता है। प्रभू आप ही (जीवों से) सेवा-भगती करवाता है, और आप ही (सेवा-भगती करने वालों को जगत से) इज्जत दिलवाता है। वह प्रभू आप ही गुणों का खजाना है, और आप ही (अपने गुणों में) समाधी लाता है ॥३॥ हे भाई! वह प्रभू प्यारा आप ही सब से बड़ा है और सब का प्रधान है। वह आप ही (अपना) तोल और पैमाना इस्तेमाल कर के (अपने पैदा किए हुए जीवों के जीवन का) मुल्य पाता है। वह प्रभू आप अतुल्य है (उस की बुजुर्गी का माप नहीं हो सकता) वह (जीवों के जीवन सदा) तोलता है। हे दास नानक जी! (कहो-) मैं सदा उस से सदके जाता हूँ ॥४॥५॥
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