सिख धर्म के शहीदों की पंक्ति में जिस महान शहीद का यहाँ उल्लेख किया जा रहा है, वह चमकौर साहिब की जंग का एक अनमोल रत्न है, जिनका नाम भाई संगत सिंह है। भाई संगत सिंह जी की महानता इस बात में भी निहित है कि उन्हें दशम गुरु श्री गुरु गोबिंद सिंह जी से अपनी कलगी उनके सिर पर धारण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। भाई संगत सिंह जी के जीवन इतिहास से ज्ञात होता है कि उन्होंने अपना पूरा जीवन दशम पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के चरणों में समर्पित भाव से बिताया। होश संभालते ही वे श्री आनंदपुर साहिब आ गए थे। उन्हें शस्त्र विद्या, निशानेबाज़ी और नेज़ेबाज़ी में विशेष दक्षता प्राप्त थी, जिससे स्पष्ट होता है कि उन्होंने स्वयं को युद्ध के लिए पूर्णतः तैयार कर लिया था। चमकौर साहिब की जंग से पहले भाई संगत सिंह जी अनेक युद्धों में भाग ले चुके थे। उन्होंने साहिबज़ादा बाबा अजीत सिंह जी के साथ बसी कलां से पंडताणी को छुड़ाने, भंगाणी के युद्ध, अगमपुरा की लड़ाई तथा सरसा की जंग में अपनी वीरता का परिचय दिया। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी को भाई संगत सिंह जी की बहादुरी और निष्ठा पर पूर्ण विश्वास था। गुरु जी उन्हें अत्यंत सम्मान देते थे। इतिहास के अनुसार, आनंदपुर साहिब छोड़ने के बाद शासकों ने अपनी कसमों को तोड़ते हुए गुरु जी पर अचानक हमला कर दिया। उस समय भी घमासान युद्ध हुआ और सिख वीरों ने मुगल सेनाओं का डटकर सामना किया। सरसा नदी पार करते समय गुरु जी का परिवार बिछड़ गया। गुरु जी दो बड़े साहिबज़ादों और चालीस सिंहों सहित चमकौर की कच्ची गढ़ी में पहुँचे। मुगल सेनाओं ने, जो लाखों की संख्या में थीं, गढ़ी को चारों ओर से घेर लिया। चमकौर की इस भूमि पर विश्व का एक अद्वितीय युद्ध लड़ा गया, जहाँ एक ओर केवल चालीस भूखे-प्यासे सिंह थे और दूसरी ओर लाखों की शत्रु सेना। इस युद्ध में गुरु जी के साहिबज़ादे बाबा अजीत सिंह जी और बाबा जुझार सिंह जी सहित अनेक सिंह रणभूमि में जूझते हुए शहीद हो गए। सूर्यास्त के बाद युद्ध थम गया और गढ़ी में केवल गिने-चुने सिंह शेष रह गए। सभी जानते थे कि यह उनकी जीवन की अंतिम रात हो सकती है, फिर भी प्रत्येक सिख के मन में गुरु के लिए बलिदान देने का उत्साह था। सबको यह चिंता थी कि यदि गुरु गोबिंद सिंह जी गढ़ी में ही शहीद हो गए, तो अत्याचारी फिर से सिखों को दबा लेंगे। परंतु यदि गुरु जी जीवित रहे, तो वे कठिन समय में भी पंथ का मार्गदर्शन कर सकेंगे। इसलिए यह निर्णय लिया गया कि खालसा पंथ की रक्षा हेतु गुरु जी का सुरक्षित निकलना आवश्यक है। अंततः निर्णय हुआ कि गुरु जी के साथ भाई दया सिंह जी, भाई धरम सिंह जी और भाई मान सिंह जी जाएँगे। गढ़ी में बचे सिंहों में से भाई संगत सिंह जी का स्वरूप गुरु जी से बहुत मिलता-जुलता था। गुरु गोबिंद सिंह जी ने उन्हें अपने प्रिय सिख होने का सम्मान दिया, उन्हें अपने हृदय से लगाया और अपनी प्रिय कलगी भाई संगत सिंह जी के सिर पर सजा दी। अपने शस्त्र और वस्त्र भी उन्हें प्रदान किए। गुरु जी ने भाई संगत सिंह जी से कहा कि उनके जाने के बाद वे गुरु की वेशभूषा धारण कर मोर्चे पर बैठें और मुगल सेना का डटकर सामना करें, तथा जीवित शत्रु के हाथ न आएँ, बल्कि युद्ध करते हुए शहीदी प्राप्त करें। मुगल सेनाएँ भाई संगत सिंह जी को गुरु गोबिंद सिंह जी समझकर तीरों की वर्षा करती रहीं। भाई संगत सिंह जी ने कृपाण, तीरों और नेज़ों से शत्रुओं को भारी क्षति पहुँचाई। घायल होने पर भी वे अंतिम क्षण तक ‘फ़तेह’ के जयकारे लगाते रहे और गुरु जी के आदेशों पर पूर्णतः खरे उतरे। अंततः वे भी गुरु की इच्छा में समर्पित होकर शहीदी का जाम पी गए। इस प्रकार भाई संगत सिंह जी ने सिद्ध कर दिया कि गुरु के आदेश में रहकर धर्म के लिए बलिदान देना सच्चे वीरों का कार्य है। आज सिख इतिहास में भाई संगत सिंह जी को अत्यंत सम्मान और गौरव प्राप्त है। उनके जीवन से गुरु के प्रति समर्पण और धर्म के प्रति अटूट निष्ठा का अनुपम उदाहरण मिलता है। आज के समय में, जब मनुष्य भौतिकवाद की अंधी दौड़ में मूल्यों से दूर होता जा रहा है, तब भाई संगत सिंह जी जैसी महान हस्तियों से प्रेरणा लेना और भी आवश्यक हो जाता है। माता-पिता का भी कर्तव्य है कि वे अपने बच्चों को ऐसे महान शहीदों के बारे में बताएँ, ताकि वे अच्छे इंसान बनकर जीवन के मार्ग पर सफलतापूर्वक आगे बढ़ सकें।
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