आज जब मैं श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी का इतिहास लिखने लगा, तो यह सोचकर मन उलझ गया कि कहाँ से शुरू करूँ—पिता की शहादत से, या पुत्रों और माता जी की कुर्बानी से। फिर सोचा, क्या एक महान योद्धा से शुरुआत करूँ? लेकिन तब महान कवि पीछे रह जाता। यदि यह सब लिखने की कोशिश करूँ, तो फिर महान पुरुष, महान गुरु, महान शिष्य, महान बादशाह, महान दरवेश, महान पुत्र, महान पिता, महान क्रांतिकारी, अमृत के दाता, उच्च और पवित्र विचारों के स्वामी—न जाने कितने रूप सामने आ जाते हैं। गुरु गोबिंद सिंह जी के जीवन को देखते हुए मन चकरा जाता है। फिर मैंने सोचा कि क्यों न आज वही लिखा जाए, जिसे हम आज भी महसूस कर सकते हैं और जिसे गुरु पर अटूट विश्वास रखने वाले हमेशा अनुभव करते रहेंगे। वह अनुभूति जो गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी के देह रूपी चोला त्यागने के कई वर्षों बाद भी महसूस की गई—मनवाड़ की धरती पर राजा रुस्तम राव और राजा बाला राव ने। जब उन्होंने सच्चे मन से गुरु गोबिंद सिंह जी को याद किया और भरपूर श्रद्धा से प्रार्थना की—“हे दो जहानों के स्वामी, हमें इस नर्क समान कैद से मुक्त कर दो और फिर से आज़ादी प्रदान करो।” उनकी विनती सुनकर गुरु गोबिंद सिंह जी घोड़े सहित उनके सामने प्रकट हुए और घोड़े की रकाब थमवाकर उन्हें उस किले से मुक्त करा दिया। फिर लगभग सौ वर्ष पहले, हज़ूर साहिब की पावन धरती पर गुरु का एक सिख—बाबा निधान सिंह जी—पहुंचा और आने-जाने वाली संगत की यथासंभव सेवा करने लगा। वहाँ के पुजारियों के विरोध और धन की कमी के कारण, जब बाबा निधान सिंह जी पंजाब लौटने के लिए रेल स्टेशन पर गाड़ी का इंतज़ार कर रहे थे, तब गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी उनके सामने प्रकट हुए और बोले—“निधान सिंह, तेरी सेवा यहीं लिखी है। तू यहीं सेवा कर।” बाबा निधान सिंह जी ने कहा—“पिता जी, न तो कोई ठिकाना है और न ही पास कोई धन।” गुरु जी मुस्कुराकर बोले—“जो पिता का होता है, उस पर पुत्रों का भी अधिकार होता है। आज से तुझे धन की कमी नहीं होगी। जब भी आवश्यकता हो, अपने पिता की जेब में हाथ डालकर धन निकाल लेना। अब जा, संगत की सेवा कर।” कहते हैं कि जब बाबा निधान सिंह जी ने अमृत वेले शरीर त्यागा, तो अंधेरा होने के बावजूद एक बार आकाश में प्रकाश फैल गया। इसी प्रकार की एक घटना मेरे गाँव तरसिक्का की है। यहाँ भक्तों का एक अत्यंत सुंदर गुरुद्वारा साहिब है, जहाँ संत बाबा गुरबचन सिंह जी भगत ने लगभग 12 वर्षों तक अकाल पुरख की महान भक्ति की। जब उनका अंतिम समय निकट आया, तो उन्होंने अपने साथी बाबा प्रीतम सिंह जी को दो दिन पहले ही बता दिया—“परसों ठीक 12 बजे हम शरीर त्याग देंगे। हमें स्वयं गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज लेने आएंगे। आप संगत को दो बजे हमारे देह त्याग की सूचना देना।” बाबा गुरबचन सिंह जी अमृतधारी सिख और महान पुरुष थे। उनकी चलाई हुई मर्यादा के अनुसार हर वर्ष 26–27 मार्च को तरसिक्का में विशाल जोड़ मेला लगता है। इन बातों को बताने का आशय यही है कि गुरु गोबिंद सिंह जी आज भी हमारे अंग-संग हैं। बस आवश्यकता है उनके बताए मार्ग पर चलने की। अमृत छको, गुरु वाले बनो, बाणी और बाणे के धारणकर्ता बनो—गुरु कभी साथ नहीं छोड़ता। परिवार के सदस्य जीवन में और श्मशान तक ही साथ जाते हैं, लेकिन गुरु तो जीवन में भी और मृत्यु के बाद भी तुम्हारा साथ नहीं छोड़ता।
Please log in to comment.