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Nitnama Hindi Ai
3 months ago

साहिबज़ादों का सूबे की कचहरी में पहला दिन

11 पोह को साहिबज़ादों को सूबे की कचहरी में पेश किया गया था। आइए इतिहास पर एक संक्षिप्त दृष्टि डालते हैं। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के चारों साहिबज़ादों की शहादत विश्व इतिहास की सबसे अधिक हृदयविदारक घटनाओं में से एक है। यह एक ओर मानव क्रूरता और दरिंदगी की घिनौनी तस्वीर प्रस्तुत करती है, तो दूसरी ओर साहिबज़ादों के भीतर धर्म के लिए जूझकर बलिदान देने और सिखी के अडिग विश्वास की चरम अवस्था को उजागर करती है। जिस कुल, जाति और देश के बच्चे ऐसे बलिदान दे सकते हैं, उसका वर्तमान चाहे जैसा भी हो, उसका भविष्य महान ही होता है। गुरमत के अनुसार आध्यात्मिक आनंद की प्राप्ति के लिए मनुष्य को अपने अहंकार का त्याग करना आवश्यक है। यह मार्ग महान वीरता का कार्य है। सिख धर्म की नींव रखने वाले प्रथम पातशाह श्री गुरु नानक देव जी ने सिख मार्ग पर चलने के लिए सिर भेंट करने की शर्त रखी थी। उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1699 में खालसा की साजना की। खालसा एक आदर्श, संपूर्ण और स्वतंत्र मानव है, जिसे गुरबाणी में सचियार, गुरमुख और ब्रह्मज्ञानी कहा गया है। खालसा गुरु को तन, मन और धन अर्पित करता है और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष करते हुए बलिदान देने से कभी पीछे नहीं हटता। “जब प्रेम का खेल खेलना हो, तो सिर हथेली पर रखकर मेरी गली में आओ।” (गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 1412) गुरु जी के किला छोड़ने के बाद शत्रुओं ने सभी कसमों को तोड़ते हुए उनका पीछा करना शुरू कर दिया। सरसा नदी के निकट भीषण युद्ध हुआ, जिसमें गुरु जी के दो छोटे साहिबज़ादे और माता गुजरी जी काफिले से अलग हो गए। “कि दह लक बरायद बरूं बेख़बर।” (ज़फरनामा) माता गुजरी जी और दोनों छोटे साहिबज़ादों को गंगू ब्राह्मण मिला, जो उन्हें मोरिंडा के पास गांव सहहेड़ी अपने घर ले गया। घर पहुँचकर गंगू का मन बेईमान हो गया। उसने मोरिंडा के थानेदार को सूचना देकर बच्चों को पकड़वा दिया। थानेदार ने माता जी और बच्चों को गिरफ्तार कर सूबा सरहिंद के हवाले कर दिया। उस रात उन्हें किले के ठंडे बुर्ज में रखा गया। माता गुजरी जी और दोनों साहिबज़ादों को पूरी रात भूखा-प्यासा रखा गया। भाई मोती राम जी ने अपने परिवार को खतरे में डालकर उनके लिए दूध पहुँचाया। दूसरे दिन बच्चों को सूबा सरहिंद की कचहरी में पेश किया गया। वहाँ उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए लालच दिया गया, डराया-धमकाया गया और झूठ बोला गया कि उनके पिता मारे जा चुके हैं। बच्चों ने साहसपूर्वक अपना धर्म छोड़ने से इनकार कर दिया। वज़ीर खान ने क़ाज़ी से राय मांगी। क़ाज़ी ने कहा कि इस्लाम में बच्चों को दंड देने की अनुमति नहीं है। नवाब मालेर्कोटला के भाई शेर खान ने भी बच्चों पर अत्याचार करने से इंकार कर दिया। लेकिन दीवान सुच्चा नंद ने षड्यंत्र रचकर साहिबज़ादों के विरुद्ध वातावरण बनाया। उसके उकसावे पर वज़ीर खान ने बच्चों को पुनः ठंडे बुर्ज में भेज दिया।

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