साहिबज़ादों का सूबे की कचहरी में दूसरा दिन तारीख: 12 पोह (दिसंबर 1704) स्थान: सूबा सरहिंद – वज़ीर ख़ान की कचहरी 1. कचहरी में दूसरी पेशी पहले दिन की तरह, दूसरे दिन भी साहिबज़ादों को ठंडे बुर्ज से निकालकर सूबा सरहिंद की कचहरी में पेश किया गया। वज़ीर ख़ान को उम्मीद थी कि पूरी रात ठंडे बुर्ज में भूखे-प्यासे रहने के बाद बच्चे डर गए होंगे और शायद इस्लाम स्वीकार कर लेंगे। लेकिन जैसे ही साहिबज़ादों ने कचहरी में प्रवेश किया और गर्जना करते हुए कहा— “वाहिगुरु जी का ख़ालसा, वाहिगुरु जी की फ़तेह”, पूरी कचहरी स्तब्ध रह गई। 2. लालच और डरावे वज़ीर ख़ान ने एक बार फिर चाल चली और साहिबज़ादों को प्रेमपूर्वक बहकाने की कोशिश की। उसने कहा— “बच्चों, यदि तुम मुसलमान बन जाओ तो तुम्हें रेशमी वस्त्र, बहुमूल्य आभूषण और बड़ी रियासतें दी जाएँगी। तुम ऐशो-आराम का जीवन जियोगे।” साहिबज़ादों ने निर्भीकता से उत्तर दिया— “हमें तुम्हारे राज-पाट की कोई आवश्यकता नहीं है। हम गुरु गोबिंद सिंह के पुत्र हैं, जिन्होंने हमें धर्म के लिए अपना सर्वस्व अर्पित करना सिखाया है। हमारा धर्म हमें प्राणों से भी अधिक प्रिय है।” 3. सुच्चानंद की भड़काऊ भूमिका जब वज़ीर ख़ान बच्चों के उत्तर से निरुत्तर हो गया, तब दरबारी दीवान सुच्चानंद ने आग में घी डालने का काम किया। उसने पूछा— “यदि हम तुम्हें छोड़ दें, तो तुम क्या करोगे?” साहिबज़ादों ने बिना भय के कहा— “हम जंगल में जाएँगे, सिखों को एकत्र करेंगे, शस्त्र उठाएँगे और अत्याचार के विरुद्ध तब तक युद्ध करेंगे, जब तक यह ज़ालिम शासन समाप्त नहीं हो जाता।” यह सुनकर सुच्चानंद ने वज़ीर ख़ान को उकसाया— “ये साँप के बच्चे हैं। इन्हें छोड़ना ख़तरनाक है। इन्हें कुचल देना ही उचित है।” 4. नवाब मालेर्कोटला का ‘हाअ का नारा’ वज़ीर ख़ान ने मालेर्कोटला के नवाब शेर मुहम्मद ख़ान से कहा— “तुम्हारा भाई चमारौर की लड़ाई में गुरु जी के बड़े साहिबज़ादे अजीत सिंह के हाथों मारा गया था। इन बच्चों को दंड देकर अपना बदला ले लो।” परंतु नवाब शेर मुहम्मद ख़ान ने मानवता का परिचय देते हुए कहा— “मेरा बदला उससे था जो युद्धभूमि में लड़ा। ये मासूम बच्चे निर्दोष हैं। इन पर अत्याचार करना इस्लाम के विरुद्ध है।” उसने वज़ीर ख़ान के निर्णय के विरोध में ‘हाअ का नारा’ लगाया। 5. क़ाज़ी का फ़तवा अंततः वज़ीर ख़ान ने क़ाज़ी को बुलाया। क़ाज़ी ने शरीअत के नाम पर फ़तवा जारी किया कि इन बच्चों को जीवित ही नींवों में चिनवा दिया जाए। इस फ़तवे को सुनकर भी साहिबज़ादों के चेहरे पर कोई भय या शिकन नहीं आई।
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