जब इन दिनों में श्री आनंदपुर साहिब में आठ महीनों तक घेरा पड़ा और खाने-पीने का सामान समाप्त हो गया, तब पातशाह जी का यह प्रिय घोड़ा भी भूख से तड़प-तड़प कर प्राण त्याग गया। दसमेश जी को नीले के शाह असवार के रूप में जाना जाता है और उनका यह स्वरूप जन-मानस में गहराई से बस गया है— नीला घोड़ा बांका जोड़ा, हाथ विच बाज़ सुहाए ने, चलो सिंहो चल दर्शन करिए, गुरु गोबिंद सिंह आए ने। आइए जानें यह नीला घोड़ा कौन था। गुरप्रताप सूरज ग्रंथ में लिखा है कि महाराज जी की सवारी के लिए कपूरे चौधरी ने श्री आनंदपुर साहिब में एक अत्यंत सुंदर घोड़ा भेंट किया था, जिसे उसने 1100 रुपये में खरीदा था। श्री दसमेश जी ने इसे स्वीकार कर अपनी सवारी के लिए नियुक्त किया और इसका नाम दलशिंगार रखा। भाई संतोष सिंह लिखते हैं— जंगल विखे कपूरा जाट, केतक ग्रामन को पति राठ। इक सौ इक हज़ार धन दे कै, चंचल बली तुरंगम लै कै। सो हुज़ूर में दयो पुचाई, देख्यो बहु बल सों चपलाई। अपने चढ़बे हेत बंधायो, दल शिंगार तिह नाम बतायो। यह घोड़ा इतना बुद्धिमान और संवेदनशील था कि प्यासा होने के बावजूद वह उन तालाबों से पानी नहीं पीता था जहाँ निघुरे (अधार्मिक) पुरुष रहते हों। वह उन स्थानों से भी नहीं गुजरता था जहाँ तंबाकू बोया गया हो। एक बार पहाड़ी राजाओं ने महाराज जी पर आक्रमण किया, जिन्हें खदेड़ दिया गया। महाराज जी का स्पष्ट आदेश था कि भागते हुए शत्रु का पीछा न किया जाए, लेकिन सिंहों में इतना जोश आ गया कि वे पीछे हटते पहाड़ियों का पीछा करने लगे। आदेश की अवहेलना देखकर महाराज जी ने सिंहों की ओर पीठ करके नीले घोड़े को वापस मोड़ लिया। उसी समय सिंहों को युद्ध में हानि होने लगी। अपनी भूल का एहसास कर दो सिंह दौड़ते हुए महाराज जी के पीछे पहुँचे, परंतु महाराज जी नहीं रुके। एक सिंह आगे निकल गया, फुर्ती से नीले के आगे ज़मीन पर रेखा खींच दी और हाथ जोड़कर बोला— “तुझे गुरु की आन है, यदि तू एक भी कदम आगे बढ़ाया।” यह सुनते ही तेज़ और बलवान नीला मूर्ति-वत खड़ा हो गया। महाराज जी ने बहुत एड़ियाँ मारीं, पर वह रेखा नहीं लांघा। सतगुरु जी मुस्कुराए, घोड़े से उतर आए और स्नेहपूर्वक बोले— “तू तो कोई मसंद है, जो इनका इतना लिहाज़ करता है।” सिंहों ने क्षमा माँगी और नीले का धन्यवाद किया। प्रेम से वे उसे दल बिडार भी कहते थे। जब श्री आनंदपुर साहिब में आठ महीनों का घेरा पड़ा और अन्न-जल समाप्त हो गया, तब महाराज जी का यह प्रिय घोड़ा भी भूख से तड़प-तड़प कर प्राण त्याग गया। इस समय का वर्णन पंथ प्रकाश में इस प्रकार मिलता है— इक इक मुट्ठी चने मिले हैं, अठ पहरे सो भी न थैं हैं। हस्ती प्रसादी लौ भारे, दल बिडार से घोड़े मारे।
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