दसमेश पिता धन-धन श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी के पटना साहिब में 1666 ई. में प्रकाश होने के 3–4 महीने बाद, अर्थात् 25 अप्रैल 1667 ई. को भाई संगत सिंह जी का जन्म भाई रणिया जी और बीबी अमरो जी के घर हुआ। भाई संगत सिंह जी का चेहरा-मोहड़ा हूबहू दसमेश पिता के चेहरे से मिलता-जुलता था। इसी कारण चमकौर की गढ़ी में गुरु गोबिंद सिंह जी ने भाई संगत सिंह जी के सिर पर कलगी सजा कर शत्रु को ललकारते हुए बाहर निकलने की योजना बनाई। आइए, संगत जी, आपको चमकौर की गढ़ी की ओर ले चलते हैं। गुरु जी ने साहिबजादा अजीत सिंह जी को शाबाशी देकर अन्य सिंहों के साथ युद्ध के लिए भेजा। बाबा अजीत सिंह जी और अन्य सिंहों ने अंतिम सांस तक दुश्मनों से लड़ते हुए अंततः शहादत का जाम पिया। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने युद्ध का सारा दृश्य अपनी आंखों से देखा और जयकारा लगाते हुए कहा— “आज ख़ास भया खालसा, सतिगुरु के दरबार।” इसके बाद गुरु जी ने साहिबजादा जुझार सिंह जी को अपने हाथों से युद्ध के लिए तैयार कर अन्य सिंहों के साथ भेजा। बाबा जुझार सिंह जी के रणभूमि में उतरते ही युद्ध फिर भड़क उठा। मुग़ल सेनाओं की संख्या अधिक होने के कारण उन्होंने सिंहों को चारों ओर से घेर लिया। साहिबजादा जुझार सिंह जी ने नेज़ा हाथ में लेकर शत्रुओं को भूसे की तरह भेदना शुरू कर दिया। ऊपर से गुरु गोबिंद सिंह जी ने तीरों की वर्षा कर घेरा तोड़ दिया। अंततः बाबा जुझार सिंह जी भी एक महान योद्धा की भांति शहीद हो गए। मिर्ज़ा अब्दुल गनी लिखता है— “बेटे की हत्या की खबर मिली, तो सिर उठाकर अल्लाह का शुक्र अदा किया। आज मेरी अमानत पूरी हुई, बेटे की जान धर्म के लिए कुर्बान हुई।” इसके बाद शत्रु सेनापतियों ने योजना बनाई कि सुबह गढ़ी में मौजूद शेष सिंहों को पकड़ लिया जाए। उधर शेष सिंहों ने गुरमत के अनुसार विचार किया। पंच प्यारे चुने गए और गुरु पंथ के आदेश से गुरु जी को गढ़ी छोड़ने का हुक्म दिया गया। गुरु जी ने पंथ का आदेश स्वीकार किया। गुरु जी ने अपने समान रूप वाले भाई संगत सिंह जी को अपनी पोशाक और कलगी पहनाकर गढ़ी की ऊँची ममटी पर बैठाया ताकि शत्रु को गुरु की उपस्थिति का भ्रम बना रहे। अगले दिन 9 पोह 1761 विक्रमी को मुग़लों ने हमला किया। वे भाई संगत सिंह जी को गुरु समझ बैठे। अंततः भाई संगत सिंह जी और शेष सिंहों ने वीरतापूर्वक युद्ध करते हुए महान शहादत प्राप्त की। यह थी महान योद्धा भाई संगत सिंह जी की वीर गाथा—एक आदर्श गुरसिख, निडर, त्यागी और गुरु घर के प्रति पूर्ण समर्पित। सिख इतिहास में उनका नाम सदैव गर्व के साथ लिया जाएगा।
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