माछीवाड़ा के रहने वाले निहाला खत्री की बोढ़ी (बुज़ुर्ग) माता गुरदेई अक्सर कहती थीं — “ओ बेटे निहाले, दसवें पातशाह श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज मेरी इच्छा ज़रूर पूरी करेंगे। क्योंकि अब मैं बुज़ुर्ग हूँ, चारपाई से उठ नहीं सकती। वे अंतर्यामी सतिगुरु स्वयं कोई उपाय करेंगे। मुझे अकाल चलाने से पहले महाराज जी के दर्शन की बहुत तीव्र तड़प है।” निहाला और परिवार के अन्य सदस्य अक्सर उन्हें समझाते — “माता, ऐसी बातें मत किया करो। तुम्हें पता है कि आनंदपुर साहिब शहर को बाईधर के पहाड़ी राजाओं और मुगल सेनाओं ने सात महीने से घेरा हुआ है। ऐसे हालातों में महाराज जी के दर्शन कैसे हो सकते हैं?” माता गुरदेई ने शांत भाव से कहा — “बेटा निहालिया, यदि मीरी–पीरी दे मालिक, छठे पातशाह श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब जी माता भाग भारना को कश्मीर जाकर दर्शन दे सकते हैं, तो महाराज मेरी गरीबन की श्रद्धा भी अवश्य पूरी करेंगे।” समय बीतता गया। माता दृढ़ विश्वास के साथ ध्यान में गुरु महाराज का स्मरण करते हुए तड़प के साथ सूत कातती रहतीं। उनके मन में इच्छा थी — “इसी सूत का चोला बनाकर मैं महाराज जी को भेंट करूँगी।” घर–परिवार के लोग नौ धियों–पुत्रों वाली इस माता का मज़ाक उड़ाते — “ये क्या कर रही है?” सन 1704, 8 दिसंबर (पोह माह) की रात, माछीवाड़ा के सरदार भाई पंजा और भाई गुलाबा ने निहाले खत्री के दरवाज़े पर दस्तक दी। निहाला हैरान — “मेरे गरीब घर पर बागों के मालिक भाई पंजा जी? क्या हुक्म है?” भाई पंजा जी बोले — “दसवें पातशाह श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज माछीवाड़े में पधारे हैं और माता गुरदेई को याद कर रहे हैं।” यह सुनते ही निहाले की आँखों से आँसू बह निकले। वह रो पड़ा — “धन गुरु! धन गुरु! धन गुरु!” वह अपनी माता के चरण पकड़कर बोला — “माता, मुझे क्षमा कर देना। तेरी भक्ति सफल हो गई!” बख़्शंद पिता कलगीधर पातशाह सचमुच माछीवाड़ा पधारे थे। माता चारपाई से उठ नहीं सकती थीं, पर जैसे पातशाह की कृपा ने चमत्कार दिखाया — माता उठकर तुरंत तैयार होने लगीं। भाई पंजा जी ने कहा — “महाराज ने फ़रमाया है कि माता द्वारा काता हुआ सूत का थान साथ लेकर आना।” यही वह थान था जिसे नबी ख़ां और घनी ख़ां ने नीला रंग करवाया, और उसे पहनकर सतिगुरु जी "ऊँचे पीर" के रूप में प्रकट हुए। कलगीधर चोजी प्रीतम सच्चे पातशाह जी की जीवन–गाथा में ऐसी अनगिनत घटनाएँ इतिहास में दर्ज मिलती हैं।
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