1 दिसंबर 1935 को सिखों और मुसलमानों के बीच हुए एक विवाद के कारण अंग्रेज़ सरकार ने धारा 144 लागू कर दी और 2 दिसंबर को सिखों पर किरपान धारण करने पर भी प्रतिबंध लगा दिया। कुछ सिख नेता पंजाब के गवर्नर से मिले और पाबंदी हटाने की मांग की, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। इसके बाद श्रीोमणि कमेटी ने 30 दिसंबर को घोषणा की कि 1 जनवरी से किरपान पाबंदी के विरुद्ध मोर्चा शुरू किया जाएगा। इस मोर्चे के लिए एक समिति बनाई गई जिसमें मास्टर तारा सिंह, जथेदार तेजा सिंह, ज्ञानी शेर सिंह आदि सदस्य चुने गए। 1 जनवरी को पहला जत्था मोर्चे के लिए रवाना हुआ। इसके बाद दूसरा जत्था मास्टर तारा सिंह के नेतृत्व में गया। इस तरह 31 जनवरी 1936 तक पूरे महीने जत्थे जाते रहे। इस दौरान कुल 1709 गिरफ्तारियाँ हुईं। अंततः अंग्रेज़ सरकार झुक गई और एक महीने बाद, 31 जनवरी को धारा 144 हटाई गई तथा किरपान पर लगाया गया प्रतिबंध भी समाप्त कर दिया गया। सिखों ने यह मोर्चा विजय के साथ जीत लिया। नोट: कई लोग कहते हैं कि अंग्रेज़ों ने सिख धर्म में दखलअंदाज़ी नहीं की। वे लोग इतिहास पढ़ लें — वास्तव में अंग्रेज़ शासन ने सिख धर्म को मिटाने के कई प्रयास किए। किरपान पर प्रतिबंध एक बार नहीं, बल्कि कई बार लगाया गया — हर बार सिखों ने विरोध किया और पाबंदी हटवाई। सिख तब भी एक विशेष पहचान थे और आज भी हैं… पंथ के वाली गुरु कलगीधर की मेहर बनी रहे।
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