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8 months ago

संध्या वेले का हुक्मनामा - 21 जुलाई 2025

अंग: 628
सोरठि महला ५ ॥ ऐथै ओथै रखवाला ॥ प्रभ सतिगुर दीन दइआला ॥ दास अपने आपि राखे ॥ घटि घटि सबदु सुभाखे ॥१॥ गुर के चरण ऊपरि बलि जाई ॥ दिनसु रैनि सासि सासि समाली पूरनु सभनी थाई ॥ रहाउ ॥ आपि सहाई होआ ॥ सचे दा सचा ढोआ ॥ तेरी भगति वडिआई ॥ पाई नानक प्रभ सरणाई ॥२॥१४॥७८॥
अर्थ: हे भाई! मैं (अपने) गुरू के चरणों से सदके जाता हूँ, (गुरू की कृपा से ही) मैं (अपने) हरेक सांस के साथ दिन रात (उस परमात्मा को) याद करता रहता हूँ जो सब जगहों में भरपूर है। रहाउ। हे भाई! गुरू प्रभू गरीबों पर दया करने वाला है, (शरण आए की) इस लोक और परलोक में रक्षा करने वाला है। (हे भाई! प्रभू) अपने सेवकों की स्वयं रक्षा करता है (सेवकों को ये भरोसा रहता है कि) प्रभू हरेक शरीर में (स्वयं ही) बचन बिलास कर रहा है।1। (हे भाई! गुरू की कृपा से) परमात्मा स्वयं मददगार बनता है (गुरू की मेहर से) सदा स्थिर रहने वाले प्रभू की सदा स्थिर रहने वाली सिफत सालाह की दाति मिलती है। हे नानक! (कह–) हे प्रभू! (गुरू की कृपा से) तेरी शरण में आने से, तेरी भक्ति, तेरी सिफत सालाह प्राप्त होती है।2।14।78।

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