बापू जी अक्सर बताया करते थे कि मेरे दादा जी को ज़मीन की बँटवारे की दुश्मनी में मार दिए जाने से पहले बहुत ज़्यादा यातनाएँ दी गई थीं। एक दिन जब वे कचहरी में तारीख भुगतने आए रिश्तेदारों से आमने-सामने हुए, तो मेरे दादा जी की खून से लथपथ लाश उनकी आँखों के सामने घूम गई। साथ ही ज़मीन पर गिरी धूल-मिट्टी से पूरी तरह सनी हुई उनकी पगड़ी भी याद आ गई। खून उबाल मारने लगा। यह सब सोचते-सोचते बापू जी का दायाँ हाथ अपने-आप डिब्बे में रखी बारह बोर की बंदूक की मूठ तक पहुँच गया। आधी बंदूक बाहर भी निकाल ली, लेकिन उसी पल उनका ध्यान मेरी ओर चला गया—जब मैं छोटा था और अपनी माँ की गोद में बैठा एक मासूम चेहरा था। हाथ की पकड़ ढीली पड़ गई। सोचने लगे—अगर रिश्तेदार को मारने के बाद जेल या फाँसी हो गई, तो उनका बेटा बर्बाद हो जाएगा… और उसके साथ-साथ उसकी माँ भी दर-दर की ठोकरें खाएगी। अपने अंजाम के बारे में सोचकर, डरे हुए इंसान में हिम्मत नहीं बची। जिस दिन 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या हुई, मैंने बापू जी से पूछ लिया कि जिन्होंने यह किया, उनमें ऐसी क्या खास बात थी? तो उन्होंने कहा— “बेटा, जिन परवानों ने कौम की पगड़ी को पैरों तले रौंदा हो, उनके हिसाब-किताब बराबर करना ज़रूरी होता है। ऐसे लोग अपनी गोद में खेलते मासूम बच्चों और साथ खड़ी बीवियों को देखकर भी डिब्बे में टंगे पिस्तौल पर अपनी पकड़ कभी ढीली नहीं करते। ना ही उन्हें सामने से आती मौत या किसी गोली का कभी डर लगा होता है।” पंथ की आन-बान-शान के लिए उस दौर की सबसे ऊँची बेरी के सिरे का बेर तोड़ने वाले भाई सतवंत सिंह और भाई केहर सिंह को शहादत दिवस पर भावभीनी श्रद्धांजलि। — हरप्रीत सिंह ज्वांदा
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