6 जनवरी सिख इतिहास का वह गौरवपूर्ण दिन है, जब पंथ की आन-बान-शान की रक्षा के लिए दो अडिग सपूतों ने हँसते-हँसते फाँसी का फंदा चूम लिया। भाई सतवंत सिंह और भाई केहर सिंह केवल व्यक्ति नहीं थे, वे सिख कौम की चेतना और आत्मसम्मान की जीवित मिसाल बन गए। पृष्ठभूमि: जब पंथ की पहचान पर हमला हुआ वर्ष 1984 सिख इतिहास का अत्यंत पीड़ादायक दौर रहा। धार्मिक स्थलों, सिख अस्मिता और मर्यादा को गंभीर चुनौती दी गई। श्री हरमंदिर साहिब पर हुआ हमला केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं था, बल्कि यह सिखों की आत्मा पर किया गया आघात था। इस अन्याय ने पूरे पंथ को भीतर तक झकझोर दिया। इतिहास गवाह है कि जब अत्याचार सीमा लाँघता है, तब प्रतिकार जन्म लेता है। अडिग निश्चय और अटल साहस भाई सतवंत सिंह जी और भाई केहर सिंह जी भली-भाँति जानते थे कि उनका मार्ग कारावास, यातनाओं और अंततः फाँसी की ओर जाता है। फिर भी उनके कदम डगमगाए नहीं। जहाँ सामान्य व्यक्ति परिवार, बच्चों और भविष्य के विचार से रुक जाता है, वहीं इन दोनों शूरवीरों ने कौम के भविष्य के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। “सबसे ऊँची बेर का सिरा तोड़ना” पंजाबी कहावत है— “सबसे ऊँची बेर के सिरे का बेर तोड़ना हर किसी के बस की बात नहीं।” यह कहावत भाई केहर सिंह जी और भाई सतवंत सिंह जी पर पूरी तरह खरी उतरती है। उन्होंने वही किया जो वही कर सकते हैं, जिनके लिए कौम की इज्जत अपने प्राणों से भी बढ़कर होती है। शहादत: मृत्यु नहीं, चेतना 6 जनवरी 1989 की शहादत केवल एक अंत नहीं थी— यह सिख पंथ के लिए एक चेतावनी, एक संदेश और एक जिम्मेदारी थी। शहादत हमें सिखाती है कि: कौम की अस्मिता समझौतों से सुरक्षित नहीं होती अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना ही सच्ची श्रद्धांजलि है इतिहास निडर और सिद्धांतवादी लोगों को ही याद रखता है आज की पीढ़ी के लिए संदेश भाई केहर सिंह जी और भाई सतवंत सिंह जी की शहादत आज भी हमसे प्रश्न करती है— क्या हम अपनी पहचान, अपने इतिहास और अपनी जिम्मेदारियों को समझते हैं? यदि शहीद केवल तस्वीरों तक सीमित रह जाएँ, तो शहादत का अर्थ अधूरा रह जाता है। श्रद्धांजलि 6 जनवरी के शहादत दिवस पर पंथ के अमर शहीद भाई केहर सिंह जी और भाई सतवंत सिंह जी को कोटि-कोटि नमन। आप इतिहास नहीं— आप सिख आत्मा की अमर आवाज़ हैं। वाहेगुरु जी का खालसा वाहेगुरु जी की फतेह ॥
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