बंदा सिंह बहादुर को शहीद करने के बाद, जब सिखों की बारी आई तो फर्रुखसियर ने कहा, “इनमें मैंने एक बाज़ सिंह का नाम सुना है, उसे पेश किया जाए।” सिपाही बाज सिंह को संगीनों के साए में बादशाह के सामने लाए। फर्रुखसियर ने बाज सिंह की ओर देखा और व्यंग्य में कहा, “सुना है तू बहुत बहादुर है, मरने से पहले ज़रा बहादुरी दिखा तो सही।” सिंह ने निर्भय होकर उत्तर दिया, “बहादुरी कोई जादू नहीं है जो मैं ज़ंजीरों में बंधा हुआ दिखा सकूं। मेरी ज़ंजीरें खुलवा, फिर तेरी दिली इच्छा भी पूरी कर दूंगा।” बादशाह ने ज़ंजीरें खोलने का आदेश दिया। सिपाहियों ने गले की भारी जंजीर और पैरों की बेड़ियां खोल दीं। जब हाथों की सिर्फ एक हथकड़ी ही खोली गई थी, तभी बाज सिंह ने ज़ोर लगाकर सिपाही से हथकड़ी वाली ज़ंजीर छीन ली, और बिजली जैसी फुर्ती से ऐसा प्रहार किया कि सिपाही को होश तक न आया। उन्होंने तीन को मार डाला और कुछ अधमरे हो गए। जब सिंह ने क्रोध से भरकर बादशाह की ओर देखा, तो वह भयभीत होकर भाग गया और दूर जाकर चिल्लाया, “ख़त्म करो इस काफ़िर को!” सिपाहियों ने तीरों और गोलियों की बारिश कर दी। बाज सिंह का पूरा शरीर छलनी हो गया। वह वहीं खड़ा-खड़ा शहीद हो गया और धरती पर गिर पड़ा। बाकी सिखों ने जयकारा लगाया – “बोले सो निहाल… सत श्री अकाल!” कई दिनों से भूखे-प्यासे बाज सिंह ने बादशाह को ऐसी वीरता दिखाई कि उसकी पूरी सेना में भगदड़ मच गई।
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