13 जनवरी का दिन सिर्फ़ लोहड़ी का त्योहार ही नहीं, बल्कि अपने भीतर बहुत बड़ा और गर्व करने योग्य इतिहास समेटे हुए है। अफ़सोस, पंजाबियों का बड़ा हिस्सा इस इतिहास से अभी भी अनजान है। हमारा गौरवशाली इतिहास 22 नवंबर 1848 को रामनगर में अपने सैकड़ों सिपाहियों और कई बड़े जर्नैलों को गंवाने के बाद अंग्रेज़ों ने एक बार फिर सिखों से लड़ाई लड़ने का फ़ैसला किया। 13 जनवरी 1849 को चेलियाँवाला गाँव में दोनों सेनाएँ आमने-सामने आ खड़ी हुईं। सरदार शेर सिंह अटारी और सरदार चत्तर सिंह के नेतृत्व में खालसा फौजें मैदान में उतरीं। पंजाब पर अंग्रेज़ी कब्ज़े को लेकर सिखों में इतना गुस्सा था कि वे इस कदर रोष और वीरता से लड़े कि यह लड़ाई अपने आप में एक अनोखा इतिहास बन गई। इस जंग में अंग्रेज़ों को भारी जानी और माली नुक़सान उठाना पड़ा। दो हज़ार से अधिक अंग्रेज़ सिपाही और सौ से अधिक अफ़सर मारे गए, और अंग्रेज़ यह लड़ाई हार गए। अंग्रेज़ों के अपने इतिहासकार और जर्नैल लिखते हैं कि चेलियाँवाला की लड़ाई उस समय की सबसे विनाशकारी लड़ाइयों में से एक थी। यदि सिख एक लड़ाई और इसी जोश-जज़्बे से लड़ लेते, तो ब्रिटिश सरकार फिर कभी पंजाब की तरफ़ देखने की हिम्मत न करती। जर्नैल थगविल तो यहाँ तक लिखता है कि उसे नहीं लगता था कि उसका कोई भी सैनिक इस जंग से बच पाएगा। लेकिन अफ़सोस, बाद में गद्दार अपनी चालों में कामयाब हो गए और सिख राज हाथों से निकल गया।
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