19 जनवरी 1922 ईस्वी बीती सदी के शुरुआती समय में, सिख चेतना में गुरुद्वारा प्रबंधन को लेकर जो विचार पैदा हुआ, उसने अकाली आंदोलन को जन्म दिया। इस आंदोलन ने गुरुद्वारा सुधार लहर में जो पंथ-निष्ठा, सिद्धांतों की दृढ़ता और बहादुरी दिखाई, उसने पूरे हिंदुस्तान को अकालियों की प्रशंसा करने के लिए मजबूर कर दिया। दरबार साहिब, अकाल तख्त और कई अन्य गुरुधाम 1920–21 में अकालियों के पंथक प्रबंध में आ चुके थे। इसी समय शिरोमणी कमेटी भी अस्तित्व में आ चुकी थी। अंग्रेज़ सरकार द्वारा नियुक्त दरबार साहिब, अकाल तख्त साहिब, बाबा अटल और तर्नतारण साहिब के इंचार्ज सरदार सुंदर सिंह रामगढ़िया — जो शिरोमणी कमेटी के मुख्य प्रधान और दरबार साहिब की लोकल कमेटी के प्रधान थे — उन्होंने भी अकाली शक्ति को स्वीकार करते हुए सुधार प्रबंधन के साथ चलना शुरू कर दिया। हालाँकि दरबार साहिब का प्रबंधन शिरोमणी कमेटी चला रही थी, परन्तु तोषेखाने (खजाने) की चाबियाँ सरकारी प्रबंधक के पास होने के कारण अकालियों को यह बात चुभ रही थी। उन्हें लगता था कि इतना संघर्ष करने के बाद भी वे पूरी तरह गुरु घर को अंग्रेज़ी नियंत्रण से मुक्त नहीं करा सके हैं। 29 अक्टूबर 1921 को शिरोमणी कमेटी की कार्यकारिणी कमेटी ने एक प्रस्ताव पारित कर भाई सुंदर सिंह रामगढ़िया से कहा कि वे तोषेखाने की चाबियाँ शिरोमणी कमेटी के प्रधान को सौंप दें। दूसरी ओर, इस प्रस्ताव की खबर तुरंत अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर को लग गई। उसने 7 नवंबर 1921 को लाला अमर नाथ EAC को पुलिस दस्ते के साथ चाबियाँ लेने भेज दिया। उन्होंने 53 चाबियों का एक गुच्छा ले लिया और रसीद दे दी। जब अकालियों को इस बात का पता चला तो उन्होंने सरकार की इस हरकत का कड़ा विरोध किया। आग पर घी का काम डिप्टी कमिश्नर के बयान ने कर दिया। उसने कहा — “शिरोमणी कमेटी सिखों की प्रतिनिधि नहीं है। सरकार दीवानी मुकदमे के माध्यम से दरबार साहिब का प्रबंधन सिखों को सौंप रही थी, पर गुरुद्वारा कमेटी ने चाबियाँ लेने में ढिलाई की है, इसलिए सरकार को चाबियाँ अपने पास लेनी पड़ीं।” इस तरह चाबियाँ छीनने पर सरकार के खिलाफ अखबारों में भी विरोध उमड़ पड़ा। पंथ सेवक ने लिखा — “एक विदेशी सरकार को गुरुद्वारों के मामलों में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है।” अकाली ने लिखा — “एक तरफ हरिमंदिर की कुंजियाँ छीन ली गई हैं और दूसरी तरफ अफ़सरशाही झूठ बोलने की हर सीमा पार कर गई है।” बंदे मातरम् ने तंज किया — “यह वैसा ही है जैसे कोई आदमी अदालत में अर्ज़ी दे कि उसने किसी की संपत्ति चोरी कर ली है और अदालत से कहे कि वह उस आदमी को संपत्ति वापस लेने का आदेश दे।” 11 नवंबर को अमृतसर में बड़ा जमावड़ा हुआ। खुफ़िया रिपोर्ट के अनुसार पंजाब के अलग-अलग हिस्सों से जत्थे पंहुचे। शाम को अकाली बाग़ में रोष सभा हुई। सरदार खड़क सिंह और जसवंत सिंह ने दमदार भाषण दिए। उसी दिन अकाल तख्त पर हुई बैठक में यह प्रस्ताव पारित हुआ कि सरकार द्वारा नियुक्त नए सरबराह—ऑनरेरी कैप्टन बहादुर सिंह—को दरबार साहिब से संबंधित किसी भी कार्य में दखल देने की इजाज़त नहीं होगी। 12 नवंबर को लाहौर में भी सरकार की कार्रवाई की आलोचना हुई। यह निर्णय लिया गया कि गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व (15 नवंबर) पर दरबार साहिब और अन्य गुरुद्वारों में दीवाली के दीयों की तरह दीपमाला नहीं की जाएगी — इसे सरकार के विरुद्ध रोष के रूप में मनाया जाएगा। खुफ़िया रिपोर्टें लिखती हैं कि अकाल तख्त से सिख सैनिकों को नौकरी छोड़ने का आदेश दिया गया था, और कुछ सैनिक इसे मानने लगे थे। रेलवे के तीन सिपाहियों ने आदेश मिलते ही नौकरी छोड़ दी। 26 नवंबर 1921 — अजनाला का घटनाक्रम डीसी ने अजनाला में सरकारी दरबार लगाया। शिरोमणी कमेटी ने इसके सामने ही अपना दीवान लगाने का ऐलान कर दिया। इश्तिहार में लिखा था कि चाबियों के मुद्दे और सरकारी चालों का पर्दाफाश किया जाएगा। इसी बीच, 24 नवंबर को, पंजाब सरकार ने स्डीशन मीटिंग एक्ट लाहौर, अमृतसर और शेखूपुरा में लागू कर दिया, यानी सभा-जुलूस करने पर रोक। 26 नवंबर को, सरकारी दरबार में डीसी ने लंबा भाषण दिया। स. दान सिंह, स. जसवंत सिंह, स. तेजा सिंह समुंदरी, स. हर्नाम सिंह और पंडित दीना नाथ ने सरकारी सभा में अपने पक्ष रखने की अनुमति माँगी, पर डीसी ने मना कर दिया। इसी पर उन्होंने रालियाँ-वाले-खूह के पास गुरु ग्रंथ साहिब का प्रकाश कर दीवान शुरू कर दिया। डीसी ने उन्हें सरकार-विरोधी भाषण का आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया। अकाल तख्त की प्रतिक्रिया यह खबर अमृतसर पहुँची तो बाबा खड़क सिंह (प्रधान) और स. बहादुर मेहताब सिंह (सचिव) अजनाला रवाना हुए। डीसी को भी संदेश भेज दिया — “हम अजनाला में भाषण देंगे, हमें भी गिरफ्तार करो।” दीवान सजा। लगभग 19 सिख भाषण कर चुके थे कि पुलिस ने बाबा खड़क सिंह और बाकी नेताओं को भी गिरफ्तार कर लिया। इन गिरफ्तारियों ने अकाली आंदोलन को और तीव्र कर दिया। शिरोमणी कमेटी ने संदेश भेजा — “हर जगह दीवान लगाकर चाबियों के मसले की सच्चाई लोगों को बताई जाए।” सिखों से यह भी कहा गया कि प्रिंस ऑफ वेल्स के भारत आने पर हड़ताल करें और किसी भी समारोह में शामिल न हों। अकालियों के इस बॉयकॉट ने सरकार को मजबूर कर दिया कि वह प्रिंस ऑफ वेल्स का अमृतसर दौरा रद्द करे। इसके बाद मास्टर तारा सिंह, डॉ. गुरबख्श सिंह, भाई करतार सिंह झब्बर सहित कई अकाली नेता गिरफ्तार किए गए। आंदोलनकारियों ने अदालत में कोई सफाई नहीं दी—सरकार की अदालत को अस्वीकार कर दिया। सरकार ने सख़्त सज़ाएँ देकर उन्हें जेल भेज दिया। लहर की तेज़ी और सरकार की चिंता खुफ़िया रिपोर्ट में लिखा है — “लहर पंजाब के सिख जिलों, खासकर ग्रामीण इलाकों में तेजी से फैल रही है और इसका असर फौज तक पहुँच गया है।” डंडे से आंदोलन न दबा पाने पर सरकार नरम-दलीय सिखों की मदद लेने लगी। पर 6 दिसंबर 1921 को शिरोमणी कमेटी ने प्रस्ताव पारित किया — “जब तक चाबियों के मामले में गिरफ्तार सभी सिख बिना शर्त रिहा नहीं किए जाते, कोई भी सिख किसी समझौते पर सहमति न दे।” नरम-दल भी सिख जनभावनाओं के विरुद्ध खड़ा नहीं हो सका और सरकार की योजना विफल हो गई। गाँधी जी की टिप्पणी गाँधी जी ने लिखा — “यदि सरकार सिखों को रिहा करती है तो उसका मज़ाक बनेगा और सिखों की शक्ति दोगुनी होगी। यदि रिहा नहीं करती तो उनकी शक्ति दस गुना बढ़ेगी। सरकार को तय करना है कि उसके लिए कौन-सा रास्ता बेहतर है।”
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