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Nitnama Hindi Ai
2 months ago

विवाह पुरब श्री गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी (गुरु का लाहौर)

अनंदपुर साहिब का दरबार सजा हुआ था। कलगीधर पिता महाराज सुशोभित विराजमान थे। शरीरिक उम्र लगभग 11 साल के आसपास थी। लाहौर से बहुत सारी संगत दर्शन के लिए आई हुई थी। इन्हीं में बाबा हरजस जी भी आए। गुरु पातशाह के दर्शन किए, कथा–कीर्तन सुना, कार्यक्रम समाप्त हुआ। दर्शन करते–करते बाबा जी के मन में विचार आया – “क्यों न मेरी बिटिया रानी जीतो को सतिगुरु कलगीधर जी के चरणों की सेवा प्राप्त हो जाए…” फिर तुरंत ही मन में दूसरा विचार आया – “वो तो दीन–दुनिया के मालिक, राजाओं के राजा हैं, और मैं इतना पापी, नीच, कलजुगी जीव!” फिर ख़याल आया – “पर सतिगुरु गरीब-नवाज़ भी तो हैं, दीनबंधु भी तो हैं।” ऐसा सोचते–सोचते बाबा हरजस जी, माता गुजरी जी और सतिगुरु जी की दादी माँ, माता नानकी जी के पास चले गए। दर्शन किए, चरणों में नमस्कार की। माताओं ने आशीर्वाद दिया। बाबा जी ने हाथ जोड़कर सिर झुकाते हुए रिश्ता की बात छेड़ी। दोनों माताएँ बहुत प्रसन्न हुईं। सारी बातचीत के बाद कहा, “सब ठीक है, पर पहले सतिगुरु जी की आज्ञा ले लो।” मामा कृपाल चंद जी को बाबा जी के साथ भेजा गया। उन्होंने गुरुदेव जी के सामने रिश्ते की बात रखी और माताओं की सहमति के बारे में बताया। पातशाह ने आज्ञा दी, इस तरह रिश्ता पक्का हो गया। कुछ समय बाद बाबा हरिदास जी ने अर्ज़ की, “महाराज, एक बिनती और है – आप जी बड़ी बारात लेकर लाहौर आइए, साथ ही संगत भी आपके दर्शन कर ले।” सतिगुरु ने मुस्कुराते हुए फरमाया: “बरात लाहौर नहीं जाएगी, बल्कि लाहौर ही यहाँ बसाएँगे। तुम्हारी भावना पूरी होगी। जाओ, तैयारी करो और अपने साक–संबंधियों को साथ लेकर आओ।” इधर, अनंदपुर से लगभग 11–12 कोस दूर, गुरु का लाहौर बसाया गया। संगत में हुक्म किया गया – “जो भी व्यापारी, दुकानदार हैं, सब यहाँ आकर बाज़ार में व्यापार करें। जिनके पास पूँजी है, वे अपनी लगाएँ, जिनके पास नहीं, वे गुरु के ख़ज़ाने से लेकर दुकान खोलें।” बाज़ार सज गया, इसी तरह गुरु का लाहौर बसाया गया। उधर बाबा हरजस जी घर जाकर, सारी बात परिजनों को बताई। रिश्ता पक्का होने की ख़बर से सब बहुत खुश हो गए। तैयारियाँ कीं और रिश्तेदारों को साथ लेकर गुरु के लाहौर पहुँचे। वहाँ की रौनक देखकर वे बहुत हैरान भी हुए और बहुत प्रसन्न भी — “हमारे लिए इतनी कृपा!” फिर वे भी विवाह की तैयारियों में लग गए। जब विवाह के दिन नज़दीक आए, इधर से अनंदपुर साहिब से बारात चली। बेदी, तेहण, भल्ला, सोढ़ी – सभी परिवारों के लोग पहुँचे। माता वीरों जी के पाँचों पुत्र, मामा कृपाल चंद, भाई दैया राम आदि भी साथ चले। जहाँ राह में पड़ाव किया गया और सेहरा बाँधा गया, वहाँ आगे चलकर गुरुद्वारा सेहरा साहिब बना। बारात ने गुरु के लाहौर में डेरा किया। मामा कृपाल चंद जी ने मिलनी करवाई। सारी रीत–रिवाज़ निभाई गईं। माता जीतो जी के साथ आनंद कारज हुआ। दो–तीन दिन तक बारात वहाँ ठहरी रही। विवाह से संबंधित कुछ और स्थान भी हैं: गुरुद्वारा पौड़ी साहिब – जहाँ सतिगुरु महाराज के घोड़े ने टाप मारी और वहाँ से जल का चश्मा फूट पड़ा। त्रिवेणी साहिब – यहाँ संगत ने पानी के बारे में बिनती की। सूरज प्रकाश के अनुसार, एक धोबी ने निवेदन किया, “महाराज, बाकी सब तो ठीक है, पर कपड़े धोने के लिए साफ़ पानी नहीं है, कपड़े निखरते नहीं हैं, कृपा कीजिए।” पातशाह उस समय घोड़े पर सवार थे। हाथ में चौड़ा, भारी बरछा था। यह बरछा देखकर बीबी वीरों के पुत्र भाई संगो जी के मन में शंका आई – “पातशाह का तन तो इतना पतला–सुडौल और शस्त्र इतना भारी!” अंतर्यामी सतिगुरु ने यह विचार जान लिया। घोड़े पर खड़े होकर ज़ोर से बरछा ज़मीन में गाड़ा और पास खड़े भाई संगो शाह की तरफ़ इशारा करके फरमाया, “लो जी, अब इसे तुम खींचो।” भाई संगो जी ने बहुत ज़ोर लगाया, पर बरछा न निकला। दशमेश पिता ने घोड़े पर बैठे–बैठे आराम से उसे खींच लिया। भाई संगो जी समझ गए कि ये तो सचमुच दीन–दुनिया के मालिक हैं, शंका करना उचित नहीं। उन्होंने सिर झुका दिया। नेड़ ही खड़े उनके भाई जीत मल के मन में ख्याल आया – “अगर पातशाह मुझे कहते, तो मैं तो दोनों हाथों से खींचकर निकाल लेता।” अंतर्यामी गुरु ने फिर बरछा ज़मीन में मारा और जीत मल को बुलाकर कहा, “लो जी, अब तुम खींचो।” जीत मल जी ने दोनों हाथों से बहुत ज़ोर लगाया, बरछा थोड़ा हिल तो गया, पर निकला नहीं। कलगीधर पिता ने पहले की तरह घोड़े पर बैठे–बैठे उसे फिर आराम से खींच निकाला। अब भाई जीत मल जी ने भी सिर झुका दिया। मामा कृपाल चंद जी पास ही खड़े यह सारा चमत्कार देख रहे थे। उन्होंने निवेदन किया, “महाराज, दो धाराएँ तो चल पड़ी हैं, आप कृपा करके एक बरछा और मारिए और त्रिवेणी बना दीजिए, ताकि यह आपके विवाह की युगों–युगों तक अटल निशानी रहे। संगत यहाँ दर्शन करने आती रहे।” कलगीधर पातशाह ने तीसरी बार बरछा मारा और खींचते हुए हँसकर फरमाया, “लो मामा जी, त्रिवेणी बन गई।” ज़मीन के अंदर से तीनों धाराएँ निकल पड़ीं और आज तक निरंतर बह रही हैं। यहाँ आज गुरुद्वारा त्रिवेणी साहिब है, दूसरा गुरुद्वारा पौड़ी साहिब, तीसरा गुरुद्वारा गुरु का लाहौर (जहाँ आनंद कारज हुआ था) स्थित हैं। उस समय की रीति के अनुसार, तीन–चार दिन तक बारात ठहरी रही। फिर विदाई लेकर डोला चला और अनंदपुर साहिब की ओर रवाना हो गए। माता गुजरी जी ने कहा, “पहले गुरुदेव पिता, धन गुरु तेग बहादुर महाराज जी के थान पर माथा टेकिए, अरदास करिए।” फिर माता जी अपनी नव-बहू (नूँह) को घर लेकर गईं। इस तरह सन 1677 में कलगीधर पिता धन गुरु गोबिंद सिंह महाराज जी का पहला आनंद कारज माता जीतो जी के साथ हुआ, जिनकी पवित्र कोख से बाबा जुझार सिंह, बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह जी का जन्म हुआ। सतिगुरु महाराज जी के विवाह-पर्ब की ख़ुशी में, गुरुद्वारा गुरु का लाहौर में बसंत पंचमी के दिन भारी जोड़–मेला मनाया जाता है। लिखित हिसाब से विवाह का महीना हाड़ माना जाता है, पर रिवाज़नुसार यह उत्सव बसंत पंचमी को ही मनाया जाता है।

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