गुरु हरिराय साहिब जी के प्रकाश पर्व की सारी संगत को लाख-लाख बधाइयाँ। आइए संक्षेप में गुरु साहिब जी के जीवन पर एक दृष्टि डालते हैं। सोढी सुल्तान गुरु रामदास साहिब जी के वंश में, गुरु अर्जन देव जी के पर-परपौते, गुरु हरिगोबिंद साहिब जी के पोते, बाबा गुरदित्त्ता जी के पुत्र— महा-बलशाली योद्धा, फौलाद जैसी देह के मालिक, और फूलों की तरह कोमल हृदय वाले गुरु हरिराय साहिब जी का प्रकाश माता निहाल कौर जी की पवित्र कोख से 14 फरवरी 1630 को कीरतपुर साहिब की पवित्र धरती पर हुआ। गुरु हरिगोबिंद साहिब जी अपने पोते हरिराय साहिब जी से बचपन से ही बहुत प्रेम करते थे। उनकी सारी शिक्षा-दीक्षा गुरु हरिगोबिंद जी की निगरानी में हुई। 🌸 कोमल हृदय गुरु हरिराय साहिब जी बचपन से ही अत्यंत दयालु और संवेदनशील थे। एक बार आप जालंधर वाले करतारपुर साहिब के एक बाग में टहल रहे थे। अचानक हवा तेज़ चली। आपने ढीला-ढाला चोला पहना हुआ था। हवा के झोंके से चोला एक फूल से अटक गया, जिससे फूल की कुछ पंखुड़ियाँ टूटकर मिट्टी में गिर गईं। यह देखकर आप दुखी हो गए और फूलों के पास खड़े होकर सोचने लगे— “ये सुंदर फूल डाली पर कितने अच्छे लग रहे थे, लेकिन मेरे चोले के कारण मिट्टी में गिर गए। फूलों की सुंदरता का नष्ट होना ठीक नहीं।” इतने में गुरु हरिगोबिंद साहिब जी वहाँ आ गए। उन्होंने कारण पूछा तो गुरु हरिराय जी ने सारी घटना सुना दी। गुरु हरिगोबिंद साहिब जी बोले— “बेटा, जब ऐसा वस्त्र पहना हो जो फैलकर कोमल चीज़ों को नुकसान पहुँचा सकता हो, तो उसे समेटकर चलना चाहिए। ताकत हमेशा समझ-बूझ से इस्तेमाल करनी चाहिए। जितनी ज्यादा ताकत, उतनी अधिक ज़िम्मेदारी।” गुरु हरिराय जी ने इस उपदेश को जीवन भर अपने हृदय में बाँधकर रखा और हमेशा तान (शक्ति) होते हुए भी निताने (विनम्र) बनकर ही व्यवहार किया। 🐾 अनूठे शिकारी गुरु हरिराय साहिब, गुरु हरिगोबिंद साहिब की तरह ही शिकार के शौकीन थे, परंतु जीवों को मारने की बजाय जिंदा पकड़ने का प्रयास करते थे। जो भी जीव पकड़े जाते, उनको अपने बाग में लाकर पालते थे। इस तरह बाग एक प्रकार का चिड़ियाघर बन गया था। 🌿 विशाल दवाखाना (निःशुल्क चिकित्सा) गुरु हरिराय साहिब दुखियों को नाम-दान देकर उनके मन की बीमारियाँ दूर करते थे। और उनके शारीरिक रोगों के उपचार के लिए आपने एक बहुत बड़ा दवाखाना खोला था, जिसमें कीमती और दुर्लभ दवाइयाँ रखी जाती थीं। रोगी किसी भी समय पहुँचता— उसे निःशुल्क दवा, भोजन, और प्रेम से सेवा दी जाती। आपके दवाखाने की ख्याति इतनी बढ़ गई कि दूर-दूर से लोग दवा लेने आते थे। 🌿 दारा शिकोह की सहायता एक बार शाहजहाँ का पुत्र दारा शिकोह गंभीर रूप से बीमार हो गया। वैद्य विशेष वजन की हरड़ और लौंग मांग रहे थे, जो कहीं नहीं मिलीं। अंत में उसे गुरु हरिराय जी के दवाखाने का पता चला। उसके मन में संशय था— “मेरा गुरु-घर से वैर रहा है, वे मेरी मदद क्यों करेंगे?” पर उसने एक व्यक्ति चिट्ठी लेकर भेजा। गुरु-घर की रीति है— “दुश्मन का भी भला करना।” गुरु हरिराय जी ने दाराशिकोह के लिए हरड़, लौंग और साथ एक “जगमोती” भी भेजी और कहा— “इसे पीसकर दवा में मिला देना, गुण बढ़ेगा।” दारा शिकोह ठीक हो गया। वह कीरतपुर आया, गुरु जी का धन्यवाद किया, और उपदेशों से अत्यंत प्रभावित हुआ। ⚔️ युद्ध बिना युद्ध—गुरु हरिराय जी की नीति गुरु हरिराय साहिब जी ने गुरु हरिगोबिंद जी के आदेश अनुसार 2200 सशस्त्र सवार रखे हुए थे ताकि अचानक आवश्यकता पड़ने पर शांति की रक्षा की जा सके। जब दारा शिकोह और औरंगज़ेब में युद्ध हुआ, दारा शिकोह हारकर भागता हुआ गुरु हरिराय जी के पास पहुँचा और विनती की— “अगर आप मेरी पीछा कर रही फौज को एक दिन ब्यास नदी पार करने से रोक लें, तो मैं लाहौर पहुँचकर जान बचा सकता हूँ।” शरण में आए व्यक्ति की रक्षा गुरु-घर का पहला नियम है। गुरु हरिराय जी ने 2200 सवार लेकर ब्यास के तट पर जाकर सभी नावें अपने नियंत्रण में ले लीं, और एक दिन तक औरंगज़ेब की सेना को नदी पार नहीं करने दिया। इस तरह— ✔ दारा शिकोह बच गया ✔ युद्ध भी नहीं हुआ ✔ किसी का रक्त भी नहीं बहाया गया 🕊️ अंतिम उपदेश गुरु हरिराय साहिब जी हमेशा गरीबों की सहायता और वਾਹिगुरु के नाम का जप करने की प्रेरणा देते थे। जब आप को अपने प्रस्थान (स्वर्गवास) का समय निकट लगा, तो आपने श्री हरिकृष्ण साहिब जी को गुरुगद्दी के लिए नियुक्त किया और संगत को आदेश दिया कि— “रामराय और विरोधियों के बहकावे में न आना। श्री हरिकृष्ण साहिब जी को ही गुरु मानना।” आप 5 कत्तक, संवत 1718 (6 अक्टूबर 1661) को कीरतपुर साहिब में जोति-जोत समा गए। आपकी देह का संस्कार सतलुज नदी के पास “पातालपुरी” नामक स्थान पर हुआ।
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