अहमद शाह अब्दाली की हार का बदला लेने के लिए, उसके बेटे तैमूर शाह ने अमृतसर साहिब के सरोवर को मिट्टी से भर देने का हुक्म दिया। इस बेअदबी और अत्याचार की खबर निहंग सिख भाई भाग सिंह ने तलवंडी साबो आकर बाबा दीप सिंह जी को दी। खबर सुनते ही बाबा जी का हृदय क्रोध और दुख से भर उठा। उन्होंने अपने 16 सेर (भारी) वाले ख़ंडे (दो धार वाली तलवार) को हाथ में उठाया और बाकी सिखों को साथ लेकर, पिंड गोहलवड़ (ज़िला अमृतसर) की ओर कूच किया, जहाँ मुग़ल फौज डटी हुई थी। वहाँ पहुँचकर बाबा जी ने मुग़ल सेना को ललकारा। भीषण और घमासान युद्ध छिड़ गया। इस युद्ध में बाबा जी का सामना मुग़ल सेनापति जमाल ख़ान से हुआ। दोनों ओर से एक ही समय पर ऐसा प्रहार हुआ कि दोनों के सिर उनके धड़ों से अलग हो गए। लेखक लिखते हैं कि यह दृश्य देखकर स्वयं “मौत” भी हँस पड़ी कि “मैंने बड़े-बड़े वीरों, सूरमाओं को जीत लिया, लेकिन आज मुझसे भी बड़ा कोई उठ खड़ा हुआ…!” उसी समय एक ऐसी विलक्षण और अद्वितीय घटना घटी, जिसकी मिसाल पूरे इतिहास में कहीं नहीं मिलती। बाबा दीप सिंह जी का शरीर हरकत में आया। बाबा जी ने अपने सीधे (दाहिने) हाथ में ख़ंडा और उल्टे (बाएँ) हाथ में अपना कटा हुआ सिर संभाल लिया और दुश्मनों से लड़ना शुरू कर दिया। यह अद्भुत दृश्य देखकर मुग़ल सैनिक हक्के-बक्के रह गए, ऐसा घबराए कि पीछे मुड़कर देखने की भी हिम्मत न हुई और भाग खड़े हुए। आख़िरकार, नवंबर सन 1757 में, बाबा दीप सिंह जी ने श्री हरिमंदर साहिब, अमृतसर साहिब की परिक्रमा के भीतर अपना सिर भेंट करके अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण की। आज भी अमृतसर साहिब जी की परिक्रमा में उनका शहीदी स्थल अत्यंत शोभायमान है और संगत वहाँ शीश नवाकर मत्था टेकती है। वाहेगुरु जी ❤️🙏 वाहेगुरु जी ❤️❤️🙏
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