यह घटना फरवरी 1762 ईस्वी की है। सिखों का एक बड़ा दल, जिसमें लगभग सभी प्रमुख जत्थेदार—बाबा जस्सा सिंह आहलूवालिया, चढ़त सिंह शुकरचकिया, जय सिंह घनैया, जस्सा सिंह रामगढ़िया, तारा सिंह और साम सिंह नारलीवाला—शामिल थे, मालवा की ओर बढ़ रहा था। इस दल के साथ बड़ी संख्या में स्त्रियाँ, बच्चे और बुज़ुर्गों का काफ़िला (वहीर) भी था। उस समय मालवा क्षेत्र को “जंगल देश” कहा जाता था। सिखों का उद्देश्य यह था कि इस काफ़िले को जंगलों वाले सुरक्षित क्षेत्र में पहुँचा दिया जाए। इसकी सूचना मालेरकोटला के शासकों को मिल गई। उन्होंने सरहिंद से ज़ैन ख़ान को बुलाया और साथ ही दूतों के माध्यम से लाहौर अहमद शाह अब्दाली को पत्र भेजा कि खालसा के सभी बड़े जत्थेदार अपने परिवारों और बच्चों सहित एकत्र हैं। यदि वह खालसा को समाप्त करना चाहता है तो तुरंत बड़ी सेना लेकर मालेरकोटला की ओर आ जाए। यह समाचार सुनते ही अहमद शाह अब्दाली अपने प्रसिद्ध सेनापतियों जहान ख़ान और सरबुलंद ख़ान के साथ विशाल सेना लेकर तेज़ी से पंजाब की ओर चल पड़ा। दूसरी ओर सिखों को इस बात की कोई जानकारी नहीं थी कि अब्दाली इस दिशा में आ रहा है। जब सिख मालेरकोटला के निकट पहुँचे तो ज़ैन ख़ान और मालेरकोटला की सेनाओं ने अचानक हमला कर दिया। सिखों ने डटकर मुकाबला किया और साथ ही यह निर्णय लिया कि काफ़िले के साथ होने के कारण उन्हें लुधियाना की ओर, माँझा क्षेत्र की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। उन्हें यह अनुमान नहीं था कि इसी मार्ग से अब्दाली की सेना भी आ रही है। कुछ कोस आगे बढ़ने पर अनुभवी सिखों को संदेह हुआ कि कुछ गड़बड़ है। तभी अब्दाली की सेना सिखों पर टूट पड़ी। सिख जत्थेदार स्वयं आगे आकर अब्दाली की सेना का सामना करने लगे। बाबा जस्सा सिंह आहलूवालिया, चढ़त सिंह शुकरचकिया और अन्य जत्थेदारों ने यह निर्णय लिया कि काफ़िले को बरनाला की ओर, बाबा आला सिंह के क्षेत्र में भेज दिया जाए, क्योंकि वह क्षेत्र सुरक्षित था। उनका सिद्धांत था—चलते जाओ, लड़ते जाओ; लड़ते जाओ, चलते जाओ। मालवा के सिखों को काफ़िले के साथ बरनाला जाने के लिए कहा गया और सभी प्रमुख जत्थेदार अब्दाली की सेना से युद्ध में डट गए। वे धीरे-धीरे पीछे हटते हुए भी लगातार लड़ते रहे। बंदूकें भरते, चलाते, फिर पीछे हटकर दोबारा भरते—शत्रु को भारी क्षति पहुँचाई जा रही थी। काफ़िला अभी थोड़ी ही दूर पहुँचा था कि ज़ैन ख़ान और मालेरकोटला की सेनाओं ने उस पर हमला कर दिया। मालवा के सिख संख्या में बहुत कम थे, इसलिए ज़ैन ख़ान की सेना ने काफ़िले का नरसंहार शुरू कर दिया। यह समाचार मिलते ही साम सिंह नारलीवाला अपना जत्था लेकर ज़ैन ख़ान को रोकने और काफ़िले को बचाने के लिए दौड़ पड़ा। साम सिंह नारलीवाला एक महान युद्ध सेनापति था। उसने पहुँचते ही ज़ैन ख़ान और मालेरकोटला की सेनाओं को पीछे धकेलकर काफ़िले के लिए मार्ग खोल दिया। इसके बाद काफ़िला धीरे-धीरे बरनाला की ओर बढ़ने लगा। इधर सिख जत्थेदार अब्दाली की सेना से अत्यंत वीरता से लड़ रहे थे और भारी क्षति भी पहुँचा रहे थे, लेकिन जब अब्दाली की अतिरिक्त टुकड़ियाँ आ पहुँचीं और जहान ख़ान तथा सरबुलंद ख़ान ने भीषण हमला किया तो सिखों की पंक्तियाँ हिल गईं। अब अब्दाली की सेना ने सिखों को पीछे धकेल दिया और वे काफ़िले के बिल्कुल पास आ गए। इसी समय अहमद शाह अब्दाली स्वयं घोड़े पर सवार होकर विशाल सेना के साथ युद्धभूमि में उतर आया। उसके आते ही हमला इतना भयानक था मानो कोई भयंकर तूफ़ान आ गया हो। चारों ओर धूल और गर्द उड़ रही थी, कुछ भी स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहा था। उस समय सिख आटे में नमक की तरह प्रतीत हो रहे थे, लेकिन खालसा किसी भी हाल में हार मानने वाला नहीं था। सिख अपने धर्म और अपनी पहचान की रक्षा के लिए लड़ रहे थे। जहाँ अब्दाली की सेना का सबसे अधिक दबाव था, वहीं स्वयं अब्दाली के सामने खालसा के नेता ‘सुल्तान-उल-क़ौम’ सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया डटकर युद्ध कर रहे थे। अन्य जत्थेदारों ने भी अब्दाली की सेना को रोके रखा। सभी जत्थेदार क्रोध से भरे हुए थे। दाँत भींचकर वे बंदूकों, तीरों और तलवारों से शत्रु पर टूट पड़े। लाशों के ढेर लग गए, लेकिन फिर भी हालात काबू में नहीं आ रहे थे। अब्दाली की सेना समुद्र की तरह विशाल थी—सिख उसे मारते जा रहे थे, लेकिन वह समुद्र की लहरों की तरह बार-बार उमड़कर सामने आ रही थी। (आगे अगली पोस्ट में) ✍️ मालविंदर सिंह बमाल
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अहमद शाह अब्दाली को सबसे अधिक नुकसान सिखों ने ही पहुँचाया था। जब भी अब्दाली हिंदुस्तान को लूटकर काबुल लौटता,...
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