Nitnama Nitnama
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1 month ago

संध्या वेले का हुक्मनामा - 25 फ़रवरी 2026

अंग: 633
सोरठि महला ९ ॥ इह जगि मीतु न देखिओ कोई ॥ सगल जगतु अपनै सुखि लागिओ दुख मै संगि न होई ॥१॥ रहाउ ॥ दारा मीत पूत सनबंधी सगरे धन सिउ लागे ॥ जब ही निरधन देखिओ नर कउ संगु छाडि सभ भागे ॥१॥ कहंउ कहा यिआ मन बउरे कउ इन सिउ नेहु लगाइओ ॥ दीना नाथ सकल भै भंजन जसु ता को बिसराइओ ॥२॥ सुआन पूछ जिउ भइओ न सूधउ बहुतु जतनु मै कीनउ ॥ नानक लाज बिरद की राखहु नामु तुहारउ लीनउ ॥३॥९॥
अर्थ: हे भाई! इस जगत में कोई (अंत तक साथ निभाने वाला) मित्र (मैंने) नहीं देखा। सारा संसार अपने सुख में ही लगा हुआ है। दुख में (कोई किसी के) साथ (साथी) नहीं बनता ॥१॥ रहाउ ॥ हे भाई! स्त्री, मित्र, पुत्र, रिश्तेदार-यह सारे धन के साथ (ही) प्यार करते हैं। जब ही इन्होंने मनुष्य को कंगाल देखा, (तभी) साथ छोड़ कर भाग जाते हैं ॥१॥ हे भाई! मैं इस पागल मन को क्या समझाऊं ? (इस ने) इन (कच्चे साथियों) के साथ प्यार पाया हुआ है। (जो परमात्मा) गरीबों का रक्षक और सभी डर नाश करने वाला है उस की सिफ़त-सलाह (इस ने) भुलाई हुई है ॥२॥ हे भाई! जैसे कुत्ते की पूंछ सीधी नहीं होती (इसी तरह इस मन की परमात्मा की याद से लापरवाही हटती नहीं) मैंने बहुत यत्न किया है। हे नानक जी! (कहो – हे प्रभू! अपने) मुढ़-कदीमा के (प्यार वाले) स्वभाव की लाज रखो (मेरी मदद करो, तो ही) मैं आपका नाम जप सकता हूँ ॥३॥९॥

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