होला महल्ला खालसाई शान-ओ-शौकत का प्रतीक और एक राष्ट्रीय एकता का पर्व है। यह पर्व खालसा पंथ की जन्मस्थली तख़्त श्री केसगढ़ साहिब में धार्मिक परंपराओं के अनुसार मनाया जाता है। इस दिन आनंदपुर साहिब सहित पूरा क्षेत्र खालसाई रंग में रंग जाता है। खालसा पंथ होली नहीं खेलता, बल्कि होला खेलता है और महल्ला निकालता है। ‘होला’ शब्द अरबी भाषा के शब्द हूल से बना है, जिसका अर्थ है— नेक कार्यों के लिए संघर्ष करना, सिर हथेली पर रखकर लड़ना, और तलवार की धार पर चलना। ‘महल्ला’ शब्द का अर्थ है वह स्थान जहाँ विजय प्राप्त करने के बाद पड़ाव डाला जाए। दसवें गुरु, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने पतित समाज के दबे-कुचले और शोषित लोगों को आत्मसम्मान और अपने अस्तित्व का बोध कराने, उनमें निर्भीकता भरने और वीर योद्धा बनाने के लिए खालसा पंथ की स्थापना की। गुरु जी ने चरण-पाहुल की जगह खंडे-बाटे का अमृत और होली की जगह होला-महल्ला को प्रचलित किया। स्वतंत्रता की भावना जागृत करने और जोश पैदा करने के लिए गुरु जी ने न केवल नया जीवन दिया, बल्कि भारतीय समाज की परंपराओं, रीति-रिवाजों और त्योहार मनाने के तरीकों में भी क्रांतिकारी परिवर्तन किए। भाई कन्हैया सिंह के अनुसार ‘होला’ का अर्थ आक्रमण या धावा बोलना है। डॉ. वंजारा बेदी के अनुसार ‘मुहल्ला’ अरबी शब्द महल्ले का तद्भव है, जिसका अर्थ उस स्थान से है जहाँ विजय के बाद पड़ाव डाला जाए। प्रारंभ में यह शब्द इसी अर्थ में प्रयुक्त होता था— जब किसी स्थान पर सेना कब्ज़ा कर लेती थी, तो वहीं दरबार लगता था, शस्त्रधारी योद्धा अपने कौशल का प्रदर्शन करते थे। धीरे-धीरे यह शब्द जुलूस के लिए प्रचलित हो गया, जिसमें सेना साज-सज्जा के साथ नगाड़ों की गूंज में आनंदपुर साहिब के एक गुरुद्वारे से दूसरे गुरुद्वारे तक जाती थी। श्री गुरु गोबिंद सिंह जी खालसा को युद्ध-विद्या में निपुण बनाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने इस पर्व को वीरता से जोड़ा। महल्ला एक प्रकार का अभ्यासात्मक युद्ध होता है, जिसमें पैदल और घुड़सवार शस्त्रधारी सिख दल बनाकर निर्धारित स्थान पर आक्रमण करते हैं और अनेक प्रकार के कौशल दिखाते हैं। गुरु जी स्वयं इन युद्ध अभ्यासों को देखते और दोनों दलों को आवश्यक मार्गदर्शन देते थे। जो दल विजयी होता, उसे दीवान में सिरोपाओ प्रदान किया जाता। घुड़सवारी और गतका के युद्ध कौशल अत्यंत दर्शनीय होते हैं। इस अवसर पर दीवान सजते हैं, कथा-कीर्तन होता है, वीर रस की वारें गाई जाती हैं और अनेक प्रकार के सैन्य अभ्यास होते हैं। चारों ओर चढ़दी कला का वातावरण बना रहता है। गुरु साहिब स्वयं इन सभी गतिविधियों में भाग लेते और सिखों का उत्साह बढ़ाते थे। आनंदपुर साहिब की धरती पर होला महल्ला के रूप में मनाया जाने वाला यह युद्धात्मक पर्व सिखों के अभ्यास युद्धों के माध्यम से भारतीय जनता का मनोबल ऊँचा करता रहा। लोग कायरता के वातावरण से बाहर निकलकर इस उत्सव में बड़े उत्साह और साज-सज्जा के साथ शामिल होने लगे। ‘होला महल्ला’ हमें एक गहरा संदेश देता है— जब तक हम इस संसार में चल रहे संघर्ष रूपी ‘महल्ले’ में पूरे बल और साहस के साथ भाग नहीं लेते, तब तक हम पीछे रह जाएंगे। यदि हम अपने जीवन को सफल बनाना चाहते हैं, तो हमें पिता कलगीधर द्वारा बताए गए उद्देश्य को स्मरण रखना चाहिए। हमें होला महल्ला से प्रेरणा लेकर एक सच्चा, कर्मठ और साहसी जीवन अपनाना चाहिए और अपनी तकदीर को नए सिरे से गढ़ना चाहिए।
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