27 मार्च 1628 ईस्वी को श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी की माता, माता गंगा जी, अपना पंच-भौतिक शरीर त्याग कर श्री गुरु अर्जन देव जी महाराज के चरणों में जा विराजीं। माता गंगा जी श्री गुरु अर्जन देव जी का पहले भी एक विवाह, श्री गुरु रामदास जी के समय में हुआ था, जिसकी पुष्टि सामान्य इतिहासकार भी करते हैं। ज्ञानी सोहन सिंह सीतल लिखते हैं कि “श्री गुरु अर्जन देव जी की पहली शादी गाँव मौड़ के भाई चंदन दास खत्री की पुत्री बीबी रामो देवी से हुई थी, जो कुछ समय बाद बिना संतान के ही अकाल चलाण कर गई। पाँचवीं पातशाही का दूसरा विवाह गाँव माओ, परगना फिलौर के भाई किशन चंद खत्री की पुत्री बीबी गंगा जी से हुआ, जो गुरु इतिहास में माता गंगा जी के नाम से प्रसिद्ध हैं और अत्यंत सम्मानित हैं।” माता गंगा जी का जन्म गाँव माओ (मौअ) (फिलौर से लगभग आठ मील दक्षिण-पश्चिम) में भाई किशन चंद खत्री के घर माता धनवंती की कोख से लगभग 1567 ईस्वी के आसपास हुआ। माता गंगा जी के विवाह की एक मौखिक परंपरा-आधारित साखी लेखक ने मौअ में गुरु जी के विवाह की स्मृति में बने गुरुद्वारे में सुनी, जो इस प्रकार है: जब श्री गुरु अर्जन देव जी यहाँ विवाह हेतु आए, तो उनके साथ नामी सिख थे जो अच्छे घुड़सवार और घोड़ों के खेलों के जानकार थे। गुरु जी स्वयं भी उत्तम घुड़सवार थे। बारात के अगले दिन, फेरों से पहले, गाँव वालों ने एक परंपरा के अनुसार गुरु जी के सामने शर्त रखी कि यहाँ जो भी दूल्हा विवाह करने आता है, उसे नेज़ाबाज़ी (भाले से निशाना साधने का खेल) दिखानी पड़ती है। गुरु जी ने इसे स्वीकार कर लिया। कुछ नौजवान गुरु जी की परख लेना चाहते थे। उन्होंने चालाकी से एक टाहली का पेड़ इस तरह काटा कि नीचे जड़ें लगी रहीं और उसे एक “किले” का रूप दे दिया। अब गुरु जी से कहा गया कि इस “किले” पर नेज़ाबाज़ी करके अपना कौशल दिखाएँ। सारा गाँव यह देखने के लिए बाहर इकट्ठा हो गया। गुरु जी ने दूर से घोड़ा दौड़ाया, भाला मारकर उस “किले” को जड़ों समेत उखाड़ लिया। लोग यह देखकर हैरान रह गए। पर अत्यधिक जोर लगने से गुरु जी का प्रिय घोड़ा वहीं अपना शरीर त्याग गया। गुरु जी ने कहा—“जैसे इस किले की जड़ें उखाड़ी गई हैं, वैसे ही मौअ गाँव की जड़ें भी उखड़ जाएँगी।” बाद में यह कथन सच हुआ; कुछ समय बाद लुटेरों ने गाँव को उजाड़ दिया। आज भी मौअ गाँव का थांव देखा जा सकता है। गुरु जी का विवाह 23 हाड़ (1588) को हुआ बताया जाता है। 21, 22, 23 हाड़ को वहाँ भारी मेला लगता है। माता गंगा जी अत्यंत भाग्यशाली थीं, जिन्हें सभी गुणों से सम्पन्न सास माता भानी जी और धैर्यशील, सहनशील, मधुर वचन बोलने वाले गुरु-पति श्री गुरु अर्जन देव जी मिले। माता गंगा जी ने आते ही माता भानी जी की आवश्यक सेवा-संभाल आरम्भ कर दी। वे गुरु जी के हर कार्य में रुचि लेतीं और हर प्रकार से सहयोग करतीं। इतिहास में इसके प्रमाण मिलते हैं। उदाहरण के लिए, जब आदि ग्रंथ की रचना हेतु गुरु जी को लंबे समय तक बाहर रहकर गुरबाणी और भगत-बाणी एकत्र करनी पड़ी, तब माता जी ने पीछे घर-परिवार को बहुत सुघड़ता से सँभाला। गुरु जी लौटे तो माता जी इस महान कार्य की सफलता पर अत्यंत प्रसन्न हुईं। भाई संतोक सिंह ने इसका उल्लेख इस प्रकार किया है— “जिस कारज गमने करिआए। सनि गंगा मन आनंद पाऐ...” माता गंगा जी गुरु-पति की सेवा में मग्न रहकर मानसिक आनंद प्राप्त करतीं। सेवा, सिमरन, सब्र-संतोष और त्याग उनके जीवन के गहने बन चुके थे। इस प्रेम और सेवा का वर्णन भाई संतोक सिंह इस प्रकार करते हैं— “अंतर प्रविशे उठि सी गंगा...” संतान का अभाव और बाबा बुद्धा जी से आशीर्वाद काफी समय बीत जाने पर भी माता गंगा जी को संतान नहीं हुई, तो वे चिंतित रहने लगीं। ऊपर से प्रिथी चंद की पत्नी करमो की ईर्ष्यालु बातें सुनकर चिंता और बढ़ गई। एक बार जब गुरु घर के कीमती वस्त्र संदूकों से निकालकर हवा लगवाने हेतु बाहर रखे गए, तो करमो जल उठी। उसने प्रिथी चंद को उकसाया कि ऐसे वस्त्र उनके घर में भी होने चाहिए थे, यदि वह पिता की सेवा करता। प्रिथी चंद ने कहा—“गंगो की कौन सी कोख हरी होनी है? गद्दी तो तेरे बेटे मेहरबान के पास ही आएगी।” गुरु अर्जन देव जी मेहरबान को बहुत प्यार करते और पास रखते थे। यह सब बातें माता गंगा जी ने सुन लीं और गुरु जी को बता कर पुत्र की याचना की। गुरु जी ने कहा—“यह याचना बाबा बुद्धा जी पूरी कर सकते हैं। वे पूर्ण ब्रह्म अवस्था को पहुँचे हुए हैं, पाँचों गुरुओं के दर्शन कर चुके हैं। तुम शुद्ध लंगर बनाकर उन्हें छकाओ।” माता जी माताओं व सेवकों के साथ साज-धजकर, गाड़ी पर लंगर के बर्तन लादकर “बाबा की बीड़” पहुँचीं। दूर से “लिश्कारा” (बर्तनों की चमक) और “खड़का” सुनकर बाबा जी ने पूछा, तो बताया गया—“गुरु के महल आ रहे हैं।” बाबा बुद्धा जी के मुख से शब्द निकले— “गुरु क्यां नूं किधर भाजड़ां पई गईआं...” ऐसे शब्द सुनकर (जो वरदान की बजाय डांट जैसे लगे) माता जी निराश होकर लौट आईं। गुरु जी ने समझाया कि वर प्राप्त करने हेतु अहंकार छोड़कर अत्यंत नम्रता से, सरल वेश में अकेले जाना चाहिए। तब माता गंगा जी ने अमृत वेले उठकर पाठ किया, दूध मथा, मक्खन बनाया, मिस्सी-नमकीन रोटियाँ तैयार कीं, लस्सी की मटकी पर रोटियाँ रखीं और अकेली, भत्तेहारी (साधारण) वेश में, नंगे पाँव रामदासपुर से लगभग दस मील पैदल चलकर बाबा की बीड़ पहुँचीं। गुरु जी ने जाने के लिए यह पंक्तियाँ भी बताईं— “लसी मख्खन मटकी भरो... नांगे पाइन इकला जावें...” इस तरह पहुँचीं तो बाबा बुद्धा जी स्वयं आगे बढ़कर लेने आए और प्रसाद छककर आशीर्वाद दिया कि तुम्हारे घर ऐसा महाबली योद्धा जन्मेगा जो ज़ालिमों के सिर वैसे ही कुचलेगा जैसे मैं गंडे को मरोड़ रहा हूँ। “तुमरे घर प्रगटेगा योद्धा...” बाबा जी का वचन सफल हुआ। 9 जून 1595 को गांव वडाली में भाई हेमा जी की हवेली में श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी का प्रकाश हुआ। उस स्थान को “गुरु की वडाली” और आज “छेहर्टा साहिब” भी कहा जाता है। संगतों ने बड़ी खुशियाँ मनाईं। माता भानी जी चाँद जैसे पोते को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुईं। माता गंगा जी पर भी आनंद उमड़ पड़ा। सरूप दास भल्ला ने माता जी की भावनाएँ इस प्रकार लिखीं— “माता जी लै गोद खिलावै...” षड्यंत्र और बालक की रक्षा गुरु घर के वैरी इतने बढ़ गए कि गुरु अर्जन देव जी को अमृतसर छोड़कर वडाली आना पड़ा। माता गंगा जी वहाँ सुरक्षित रहीं। भाई वीर सिंह जी ने माता जी की उदारता और वैर-भावना से ऊपर उठे स्वभाव का वर्णन “अष्ट चमत्कार” में किया है। उन्होंने लिखा कि माता जी अमृतसर आकर पहले जेठ (प्रिथी चंद) के घर गईं। बालक ने पहले प्रिथी चंद के चरणों में माथा टेका, पर अंदर से प्रिथी चंद की पत्नी के मन में ईर्ष्या बढ़ गई। फिर भी माता जी ने हृदय में वैर नहीं रखा। प्रिथी चंद के परिवार ने फतो दाई को लालच देकर बालक को ज़हर देने की योजना बनाई। उसने अपने स्तनों पर ज़हर लगाकर बालक को दूध पिलाने की कोशिश की। बालक ने मुँह न लगाया और रोने लगा। माता जी दौड़ीं और बच्चे को बचा लिया। फतो दाई ने मरते हुए सच्चाई बता दी। गुरु जी ने कोई गिला नहीं किया, बल्कि अकाल पुरख का शुक्राना किया। फिर एक ब्राह्मण के द्वारा ज़हरीला दही भेजा गया। बालक ने नहीं पिया, कुत्ते के आगे फेंक दिया; कुत्ता तड़पकर मर गया। ब्राह्मण ने भी स्वीकार किया और बाद में वह भी पेट-दर्द से मर गया। फिर एक सपेरे को भेजकर ज़हरीला साँप छुड़वाया गया। बालक हरगोबिंद जी ने साँप की गर्दन पकड़कर उसे मुट्ठी में दबा दिया और वह मर गया। सपेरा शर्मिंदा होकर लौट गया। अमृतसर लौटने पर बालक को चेचक (माता) निकल आई। माता जी चिंतित हुईं। किसी स्त्री के कहने पर राख बांधने लगीं तो गुरु जी ने रोका—“यह बालक अकाल पुरख ने बख्शा है; वही इसका रक्षक है।” कुछ दिनों बाद बालक स्वस्थ हो गया। तब गुरु जी ने शुक्राने में शबद उच्चारित किया— “सदा सदा हरि जापै... (अंग 627)” फिर बालक के साथियों द्वारा भी ज़हर खिलाने की योजना बनी; नंद नामक बालक के माध्यम से ज़हरीली और अच्छी बर्फी रखवाई गई। नंद ने स्वयं ज़हरीली खाई और गिरकर मर गया, जबकि हरगोबिंद जी को अच्छी मिली। शिक्षा और गुरु-पति की शहादत के बाद गुरु अर्जन देव जी आदि ग्रंथ साहिब की स्थापना जैसे महान कार्य में व्यस्त थे। हरगोबिंद जी की शस्त्र-शास्त्र शिक्षा की जिम्मेदारी माता गंगा जी को सौंपी गई। माता जी ने बाबा बुद्धा जी द्वारा लिखाई-पढ़ाई व गुरमत की शिक्षा, भाई परागा जी से शस्त्र विद्या और भाई गंगा सहगल से घुड़सवारी की शिक्षा दिलवाई। गुरु अर्जन देव जी की शहादत के समय गुरु हरगोबिंद जी की आयु केवल 11 वर्ष थी। माता गंगा जी पर इस शहादत का गहरा प्रभाव पड़ा। गुरु जी ने जाते समय उपदेश दिया था कि जो जन्मा है उसे एक दिन जाना ही है; शोक नहीं करना चाहिए और हरगोबिंद को धैर्य देना है। इतिहास में यह उपदेश ऐसे मिलता है— “स्री गंगा सब मत महि सयानी... करह न शोक...” शहादत के बाद माता गंगा जी ने बाणी से जुड़कर संगत को भी बाणी से जोड़ा और बालक गुरु को सफल बनाने हेतु हर प्रकार से मार्गदर्शन दिया। गुरु हरगोबिंद साहिब जी अपनी माता जी को पिता समान मान-सम्मान देते। कठिन समय में माता जी का आशीर्वाद लेते, चरणों में शीश रखकर दुआ प्राप्त करते। अकाल तख्त की स्थापना के बाद भी माता जी से आशीर्वाद लिया, और माता जी ने गले लगाकर असीस दी। माता गंगा जी का अकाल चलाण भाई मिहरा जी बकाला के महान गुरसिख थे। उन्होंने एक हवेली बनाई और निश्चय किया कि जब तक गुरु हरगोबिंद साहिब वहाँ नहीं आते, वह उसमें निवास नहीं करेंगे। रोज़ धूप-दीप कर गुरु जी को याद करते। एक दिन गुरु जी परिवार सहित बकाला पहुँचे। संगत बाहर तंबू लगा कर रहने लगी। गुरु जी और माता गंगा जी की अनुमति से माता नानकी जी माता गंगा जी को साथ लेकर अपने पीके (हरी चंद के घर) गईं। आसपास की संगतें भी उमड़ पड़ीं, लंगर चल पड़ा, कीर्तन होता, ढाढ़ी वारें होतीं, गुरु जी उपदेश देते—हवेली सचखंड-सी बन गई। इन्हीं दिनों एक दिन माता गंगा जी ने स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण किए और गुरु जी को पास बुलाकर कहा—“मेरा अंतिम समय आ गया है। पुत्र, मेरे शरीर का जल-प्रवाह करना ताकि मैं अपने पति के पास जा सकूँ।” माता जी चेत सुदी 14, सन 1628 को प्रलोक सिधार गईं (कुछ इतिहासकार 1626 भी मानते हैं)। इतिहास में आता है कि बकाला पहुँचने के चौथे दिन यह घटना हुई। गुरु जी ने जपजी और सुखमनी साहिब का पाठ किया, और माता जी समाधि-गति से सचखंड चली गईं। फिर इश्नान कर “बिबान” तैयार किया गया, फूलों की वर्षा की गई, ढोलकी आदि के साथ संगत ने अंतिम दर्शन किए। जहाँ बिबान रखा गया वहाँ “माता गंगा का डेरा” नाम का सुंदर गुरुद्वारा बना है, जो आज निहंग सिंहों के अधीन है। हर साल फरवरी में वहाँ महान रैन-सबाई कीर्तन होता है। माता जी के नाम से “माता गंगा खालसा कन्याओं का हाई स्कूल” भी बकाला में चलता है। इसके बाद बिबान संगत के जुलूस के रूप में ब्यास नदी के किनारे ले जाकर अरदास के बाद जल-प्रवाह किया गया। बिबान को कंधा देने वालों में भाई बिधी चंद, भाई पिराना, भाई जेठा, भाई साईं दास, भाई पैड़ा आदि शामिल थे। जिस स्थान पर जल-प्रवाह हुआ वहाँ आज राधा स्वामी डेरा स्थित है। माता गंगा जी ने अपने इकलौते पुत्र के विरुद्ध शत्रुओं की घातक साजिशें भी सहन कीं, फिर गुरु-पति की शहादत का दुःख भी बड़े हौसले से झेला और बाल हरगोबिंद साहिब की पूर्ण सरपरस्ती व योग्य अगुवाई की। “मीरी-पीरी” और “अकाल तख्त” जैसे क्रांतिकारी मोड़ में उनका योगदान महान माना जाता है। वे समय-समय पर संगतों और मसंदों के मन से गुरु जी के प्रति शंकाएँ दूर करती रहीं। उन्हें गुरु-पत्नी, गुरु-माता, गुरु-दादी, गुरु-परदादी और गुरु-लक्कड़ दादी (गुरु हरिकृष्ण जी) बनने का गौरव प्राप्त है। दास जोरावर सिंह तरसिक्का।
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