गुरु की शरण में आने से पहले बाबा अमरदास जी हर छह महीने बाद गंगा यात्रा किया करते थे। वे लगभग 20 बार गंगा यात्रा पर गए। एक बार जब वे गंगा से वापस लौट रहे थे, रास्ते में उन्हें एक साधु मिला। बाबा जी उसे अपने घर ले आए। बातचीत के दौरान साधु ने पूछा, “तुम्हारा गुरु कौन है?” बाबा अमरदास जी ने कहा कि उन्होंने अभी तक कोई गुरु धारण नहीं किया है। यह सुनकर साधु ने ताना मारा कि “तुम तो निगुरे हो।” साधु ने कहा कि उसने एक निगुरे व्यक्ति का संग कर लिया है और उसके सभी धर्म कर्म नष्ट हो गए हैं। साधु की ये बातें सुनकर बाबा अमरदास जी के मन को गहरी चोट पहुँची। उन्होंने सोचा कि यदि मेरे संग से किसी का धर्म नष्ट हो सकता है तो मुझे अवश्य गुरु धारण करना चाहिए। तब से उनके मन में गुरु की प्राप्ति की तीव्र इच्छा जाग उठी। गुरु अंगद देव जी की सुपुत्री बीबी अमरो जी, जिनका विवाह बाबा अमरदास जी के भाई के पुत्र बाबा जस्सू जी से हुआ था, वे अमृत वेले गुरु नानक देव जी की बाणी का पाठ किया करती थीं। एक दिन बाबा अमरदास जी ने उनसे मारू राग का यह शबद सुना: “करणी कागदु मनु मसवाणी बुरा भला दुइ लेख पए…” इस बाणी को सुनकर बाबा अमरदास जी के मन में गुरु से मिलने की इच्छा और प्रबल हो गई। बीबी अमरो जी उन्हें खडूर साहिब ले गईं, जहाँ उन्होंने गुरु अंगद देव जी के चरणों में माथा टेका और सदा के लिए गुरु की शरण में आ गए। बाबा अमरदास जी ने 12 वर्षों तक दिन-रात सेवा की। उनकी सबसे विशेष सेवा यह थी कि वे रोज़ ब्यास नदी से पानी भरकर लाते और गुरु अंगद देव जी को स्नान करवाते। चाहे गर्मी हो, सर्दी हो, वर्षा हो या तूफान, उन्होंने यह सेवा निरंतर जारी रखी। अंततः उनकी सेवा से प्रसन्न होकर चेत सुदी एकम, संवत 1609 (1552 ई.) को गुरु अंगद देव जी ने संगत के सामने पाँच पैसे और नारियल रखकर गुरु अमरदास जी को गुरुगद्दी प्रदान की। गुरु अमरदास जी ने गोइंदवाल साहिब नगर बसाया और 22 वर्षों तक गुरुगद्दी पर विराजमान रहे। उन्होंने 84 सीढ़ियों वाली प्रसिद्ध बावली बनवाई और प्रचार के लिए 22 मंजियाँ और 52 पीढ़े स्थापित किए। उन्होंने संगत के साथ-साथ पंगत (लंगर) को अनिवार्य बनाया। जब बादशाह अकबर दर्शन करने आए, तो उन्हें पहले पंगत में बैठकर लंगर ग्रहण करना पड़ा। गुरु अमरदास जी ने सती प्रथा को समाप्त करने और विधवा विवाह को बढ़ावा देने का कार्य भी किया। उन्होंने बहुत सी बाणी की रचना की, जिनमें आनंद साहिब विशेष रूप से प्रसिद्ध है और नितनेम का हिस्सा है। तीसरे पातशाह श्री गुरु अमरदास जी के गुरुगद्दी दिवस की सभी को हार्दिक बधाई।
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