माता त्रिप्ता ने दासी से कहा, “तुलसा, जाओ नानक को जगा लाओ, प्रसादा तैयार है, भोजन तैयार है।” वह गई, पर अब कैसे जगाए? सतिगुरु बहुत गहरी नींद में सोए हुए थे। जनम साखी में आता है कि उस दासी ने सतिगुरु का अंगूठा अपने मुँह में रख लिया। चरणों की उस छोह से उसके अंदर एक अद्भुत अनुभव जाग उठा। वह वापस आकर कहने लगी, “माँ! नानक जी यहाँ नहीं हैं, कहीं चले गए हैं।” तब माता त्रिप्ता कहने लगी, “लो! दुनिया कहती थी मेरा बेटा पागल है, अब नौकरानियाँ भी पागल हो गई हैं, ये दासियाँ भी बिल्कुल पागल हो गई हैं।” तब दासी हाथ जोड़कर बोली, “नहीं माँ! मुझे तो आज ही होश आया है। आप आज मुझे पागल कह रही हैं? पहले कहतीं तो ठीक था, पर आज तो मुझे असली होश मिला है, आज मुझे पागल मत कहो।” उसकी बात निराली थी। उसके शब्द कुछ और कहते थे, पर उसका भाव कुछ और था। सतिगुरु का अंगूठा क्या छुआ, सब कुछ बदल गया। सतिगुरु तो सोते भी जागरूकता में हैं। उनकी चेतना इतनी गहरी है कि कोई बुरा सपना भी नहीं आ सकता और आसपास की समझ भी बनी रहती है। नींद में भी पूरा ज्ञान उनके पास है। कहा जाता है कि जिसके रोम-रोम में ईश्वर का रस बसा हो, उसके हाथों में भी बरकत होती है। इसी कारण आशीर्वाद की परंपरा चली — देहु सजण आसीसड़िया जिउ होवै साहिब सिउ मेलु॥ (गौड़ी दीपकी, महला १, अंग १२) वास्तव में यही सबसे बड़ी आशीष है। बाकी सब छोटी-छोटी आशीषें हैं — पूता माता की आसीस॥ निमख न बिसरउ तुम कउ हरि हरि सदा भजहु जगदीस ॥१॥ रहाउ॥ (गूजरी महला ५, अंग ६९६) सबसे बड़ी आशीष यही है कि हर समय तुम्हें परमात्मा याद रहे, हर समय तुम प्रभु का सिमरण करते रहो, हर समय तुम्हें गुरु की याद बनी रहे। यह इतनी बड़ी आशीष है कि इसमें सारी आशीषें आ जाती हैं। यह इतनी बड़ी बरकत है कि इसमें सारी बरकत समा जाती है। और जहाँ परमात्मा की याद बनी रहती है, वहाँ कोई कष्ट नहीं, कोई दुख नहीं, कोई चिंता नहीं। वहाँ आनंद है, खुशी है, और आध्यात्मिक मस्ती है। — ज्ञानी संत सिंह जी मसकीन
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