25 जून को बाबा बंदा सिंह बहादुर का शहीदी दिवस आ रहा है। आइए आज से उनके इतिहास पर संक्षेप में नज़र डालते हैं। भाग पहला गुरु गोबिंद सिंह जी ने अत्याचारी शासकों द्वारा गरीबों, बेसहारा और दबे-कुचले लोगों को समानता और न्याय दिलाने के लिए जितनी कुर्बानियाँ दीं और संघर्ष किए, उसकी मिसाल दुनिया के किसी भी इतिहास में नहीं मिलती। अपने अंतिम समय में इस मिशन को जारी रखने के लिए उन्होंने नांदेड़ की धरती से बाबा बंदा सिंह बहादुर को पंजाब की ओर भेजा। बाबा बंदा सिंह बहादुर ने अत्याचारों से पीड़ित और दुखी लोगों को संगठित किया और बहुत कम समय में ही सिख इतिहास में पहली बार खालसा राज की स्थापना कर दी। गुरु गोबिंद सिंह जी ने उस समय दबे-कुचले, निराश और आत्मविश्वास खो चुकी जनता को फिर से आत्मसम्मान, साहस, संघर्ष और विजय की चढ़दी कला का संदेश दिया, जब कौम निराश, थकी हुई और लगभग समाप्त हो चुकी थी। इतिहास में वह एक महान सेनापति थे जिन्होंने अत्याचार और अन्याय के विरुद्ध सत्ता से टक्कर लेकर मुगल साम्राज्य की जड़ों को हिला दिया। लगभग आठ वर्षों तक उन्होंने पंजाब की धरती पर अपने घोड़ों के पदचिन्ह छोड़े और सिख कौम को एक शक्तिशाली राजनीतिक शक्ति में बदल दिया। उन्होंने आर्थिक और सामाजिक सुधार करके पंजाब को इतना मजबूत बना दिया कि लंबे समय तक कोई दुश्मन उसे हिला नहीं सका। मुगल शासक सिखों का नाम मिटाने की कोशिश करते-करते स्वयं मिट गए, पर सिखी को मिटा नहीं सके। 1709 से 1716 तक सात वर्षों की उनकी अगुवाई ने दक्षिण एशिया के सबसे बड़े मुगल साम्राज्य की नींव हिला दी। अंततः 25 जून 1716 को उन्होंने अपने 740 साथियों सहित जिस साहस, उत्साह और चढ़दी कला के साथ शहादत प्राप्त की, वह दुनिया के इतिहास में एक अनोखी मिसाल है। बचपन बाबा बंदा सिंह बहादुर का असली नाम लछमन दास था। वे एक राजपूत परिवार में पैदा हुए थे। उनके माता-पिता चाहते थे कि उनका पुत्र एक वीर योद्धा बने, इसलिए बचपन से ही उन्हें शस्त्र विद्या और शिकार का अभ्यास कराया गया। एक दिन उनके हाथों एक गर्भवती हिरणी का शिकार हो गया। वह हिरणी अपने अजन्मे बच्चों सहित उनके सामने तड़प-तड़प कर मर गई। यह दृश्य देखकर उनके हृदय को गहरी चोट लगी और उन्होंने घर-बार त्याग कर वैराग्य धारण कर लिया। शांति की खोज में उन्हें एक साधु जानकी दास मिले, जिन्होंने उनका नाम माधो दास रख दिया। बाद में उनकी मुलाकात साधु रामदास से हुई, पर मन को शांति फिर भी नहीं मिली। वे देश भ्रमण के लिए निकल पड़े। नासिक के पंचवटी स्थान पर उनकी मुलाकात योगी औघड़ नाथ से हुई। उनकी सेवा करते हुए उन्होंने योग साधना और तांत्रिक विद्या में महारत हासिल कर ली। तीन वर्ष बाद औघड़ नाथ की मृत्यु हो गई और उनकी सभी तांत्रिक पुस्तिकाएँ माधो दास के पास आ गईं। उन्होंने जल्द ही इन विद्या-शास्त्रों में निपुणता हासिल कर ली और उनके कई शिष्य बन गए। लोग अपनी मनोकामनाएँ पूरी करवाने के लिए उनके पास आते रहते थे, जिससे उनमें अहंकार भी आ गया। गुरु गोबिंद सिंह जी से मिलाप जब गुरु गोबिंद सिंह जी नांदेड़ पहुँचे तो उन्होंने नगिना घाट पर अपना डेरा लगाया। उसी समय माधो दास भी भ्रमण करते हुए नांदेड़ पहुँचे और गोदावरी नदी के किनारे अपने चमत्कार दिखाने लगे। नांदेड़ की संगत में से एक सिख ने गुरु जी को बताया कि माधो दास अपनी सिद्धियों से संतों को तख्त पर बैठाकर फिर तख्त उलट देता है। गुरु जी मुस्कराकर बोले, “हमें तो इस समय तख्त उलटने वाला ही चाहिए।” कुछ दिन विश्राम के बाद गुरु जी अपने सिखों सहित माधो दास के डेरे पर पहुँचे और उनके पलंग पर बैठ गए, जिस पर किसी को बैठने की अनुमति नहीं थी। जब माधो दास ने यह देखा तो वे क्रोधित हो गए और अपनी शक्तियों से पलंग उलटने लगे। पर जब उनकी कोई शक्ति काम न आई तो वे समझ गए कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है। वे गुरु जी के चरणों में गिर पड़े, क्षमा माँगी और गुरु जी के शिष्य बन गए। एक महीने तक गुरु जी के पास रहकर उन्होंने सिख सिद्धांतों को समझ लिया। उनकी तीरंदाजी देखकर गुरु जी ने उन्हें “बहादुर” की उपाधि दी और खण्डे-बाटे की अमृत दीक्षा देकर उनका नाम बंदा सिंह बहादुर (गुरबख्श सिंह) रखा। जब उन्होंने गुरु साहिब के साथ हुए अत्याचारों की कथा सुनी तो उनका खून खौल उठा और उन्होंने अत्याचारियों के विरुद्ध लड़ने की सेवा माँगी। 26 नवंबर 1708 को गुरु गोबिंद सिंह जी ने उन्हें आशीर्वाद देकर पंजाब की ओर रवाना किया। उनके साथ पाँच प्यारों की अगुवाई में भाई फतेह सिंह, भाई विनोद सिंह, भाई कान सिंह, भाई रण सिंह और भाई बाज सिंह सहित लगभग 20 सिख थे। गुरु जी ने उन्हें पाँच तीर, नगाड़ा, निशान साहिब और सिखों के लिए हुकमनामे दिए। इसके बाद बंदा सिंह बहादुर ने जहाँ-जहाँ अन्याय देखा उसका डटकर विरोध किया। धीरे-धीरे लोग उनसे जुड़ते गए और उनकी सेना 25 सिखों से बढ़कर लगभग 40,000 तक पहुँच गई। उन्होंने सोनीपत, कैथल आदि स्थानों पर विजय प्राप्त की और मुगल खजाना गरीबों में बाँट दिया। इसके बाद समाना, कपूरी, सढौरा, मुस्तफाबाद और अन्य स्थानों पर भी खालसा का झंडा लहराया। कपूरी के अत्याचारी शासक कदुमुद्दीन को कठोर दंड दिया, जो हिंदू लड़कियों की इज्जत पर अत्याचार करता था। सढौरा के शासक उस्मान खान को भी दंड दिया जिसने पीर बुद्धू शाह को यातनाएँ देकर मार डाला था। मुगल शासन के विरुद्ध यह एक बड़ा राजनीतिक विस्फोट था जिसने पंजाब की राजनीति को हिला कर रख दिया। आगे चलकर रोपड़ के पास शाही सेना से पहली बड़ी लड़ाई हुई, जिसमें सिखों ने विजय प्राप्त की और बड़ी संख्या में सिख बंदा सिंह बहादुर की सेना में शामिल हो गए। (जारी)
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बाबा बंदा सिंह बहादुर का शहीदी दिवस 25 जून को आने वाला है। उनकी शहादत को समर्पित इतिहास का दूसरा...
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