अंग: 763
रागु सूही छंत महला १ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ भरि जोबनि मै मत पेईअड़ै घरि पाहुणी बलि राम जीउ ॥ मैली अवगणि चिति बिनु गुर गुण न समावनी बलि राम जीउ ॥ गुण सार न जाणी भरमि भुलाणी जोबनु बादि गवाइआ ॥ वरु घरु दरु दरसनु नही जाता पिर का सहजु न भाइआ ॥ सतिगुर पूछि न मारगि चाली सूती रैणि विहाणी ॥ नानक बालतणि राडेपा बिनु पिर धन कुमलाणी ॥१॥
अर्थ: राग सूही, घर १ में गुरु नानक देव जी की बानी ‘छंत’ । अकाल पुरख एक है और सतगुरु की कृपा द्वारा मिलता है। हे प्रभु जी! में तेरे से सदके हूँ (तुने कैसी अचरज लीला रचाई है!) जीव-स्त्री (तेरी रची माया की प्रभाव के निचे) जवानी के समय ऐसे मस्त है जैसे शराब पी कर मदहोश है, (यह भी नहीं समझती कि) इस मायके-घर में (इस जगत में) वह एक मेहमान ही है। विकारों की कमी से मन में वह रहती है जो (गुरु की सरन नहीं आती, और) गुरु (की सरन आये) बिना (हृदय में) गुण टिक नहीं सकते। (माया की) भटकन के पड़ कर जिव-स्त्री ने (प्रभु के गुणों की कीमत नहीं समझी, कुराहे पड़ी रही, और जवानी का समां विअर्थ गवां लिया। न उस ने खसम प्रभु के साथ साँझ डाली, न उस के दर, न उस के घर और न ही उस के दर्शन की कदर पहचानी। (भटकन में रह के) जीव-इस्त्री को प्रभु पति का सवभाव ही पसंद नहीं आया। माया के मोह में सोई हुई जिव-स्त्री की जिन्दगी की सारी रात बीत गयी, सतगुरु की शिक्षा ले के जीवन के ठीक रस्ते पर कभी भी न चली। हे नानक! ऐसी जिव-स्त्री ने तो बाल-उम्र में ही रंडेपा बुला लिया, और प्रभु-पति के मिलाप के बिना उस का हृदय-कमल मुरझाया ही रहा॥१॥
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