त्याग और दया की मूर्ति, हिंद की चादर, नौवें पातशाह श्री गुरु तेग बहादुर जी का जन्म 1 अप्रैल 1621 को अमृतसर में गुरु हरगोबिंद साहिब जी के घर माता नानकी जी के गर्भ से हुआ। गुरु तेग बहादुर जी, छठे पातशाह श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी के सबसे छोटे साहिबज़ादे थे। गुरु हरगोबिंद साहिब जी के जोति-जोत समाने के बाद और गुरगद्दी मिलने तक, आप लगभग 20 वर्ष प्रभु भक्ति में लीन रहे। गुरु इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि दिल्ली से श्री गुरु हरकृष्ण साहिब जी ने बाबा बकाला में भक्ति में लीन गुरु तेग बहादुर जी को गुरगद्दी सौंपी। इससे पहले हर गुरु साहिब अपने उत्तराधिकारी को स्वयं गुरगद्दी सौंपते थे, लेकिन आठवें पातशाह को दिल्ली में चेचक रोगियों की सेवा करते हुए स्वयं चेचक हो गया और 1664 में जोति-जोत समाने से पहले उन्होंने गुरु तेग बहादुर जी की ओर संकेत करते हुए कहा — "बाबा बकाला"। इन वचनों को सुनकर कई पाखंडी, जिनमें बाबा गुरदिता जी का पुत्र धीर मल प्रमुख था, बकाला में डेरा जमा बैठे। लगभग 22 दावेदार अपने-आप को गुरु कहने लगे और संगतों को भ्रमित कर भेंट इकट्ठा करने लगे। यह सब देखकर भी गुरु तेग बहादुर जी शांत और एकांत में भजन-बंधगी करते रहे। संगतें इन तथाकथित गुरुओं के पास जातीं, लेकिन उन्हें वह आत्मिक शांति नहीं मिलती जिसकी उन्हें तलाश थी। समय बीतता गया। मार्च 1665 में माखन शाह लुबाना नाम का एक व्यापारी, जो गुरु घर का श्रद्धालु था, अपनी अरदास की 500 मोहरें भेंट करने बकाला पहुँचा। यहाँ इतने गुरु थे कि वह उलझन में पड़ गया कि किसे भेंट दे। उसने मन ही मन अरदास की कि सच्चा गुरु स्वयं अपनी भेंट मांग लेगा। वह हर एक के आगे 2-2 मोहरें रखता गया, पर किसी ने असली भेंट नहीं मांगी। अंत में उसे गुरु तेग बहादुर जी के बारे में बताया गया। वह उनके पास पहुँचा और 2 मोहरें रखीं। गुरु जी ने आँखें खोलकर कहा — "भाई सिखा! गुरु की अमानत पूरी ही देनी चाहिए, 500 में से केवल दो मोहरें?" यह सुनकर माखन शाह बहुत खुश हुआ और छत पर चढ़कर पुकारने लगा — "गुरु लाधो रे, गुरु लाधो रे!" संगतें दौड़ पड़ीं और गुरु जी के दर्शन किए। इस प्रकार गुरु तेग बहादुर जी को गुरगद्दी प्राप्त हुई और उन्होंने सिख धर्म के प्रचार के लिए यात्राएं शुरू कीं। उनकी शिक्षा से अनेक लोगों ने सिख धर्म अपनाया। आगे चलकर उन्होंने कश्मीरी पंडितों की रक्षा के लिए दिल्ली के चांदनी चौक में महान शहादत दी और हिंदू धर्म की रक्षा की।
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