8 अगस्त को गुरु का बाग मोर्चा हुए 100 साल पूरे हो जाएंगे, लेकिन आज भी इसकी याद हमारे दिलों में ताज़ा है। सरदार पियारा सिंह पदम जी बताते हैं कि हमारे बुज़ुर्गों ने किस तरह शांतिपूर्ण तरीके से शहादतें स्वीकार कीं और गिरफ्तारियां दीं। आइए इतिहास पर एक संक्षिप्त नज़र डालते हैं। गुरुद्वारा गुरु का बाग के महंत सुंदर दास थे। एक साल पहले सिख कमेटी के साथ समझौता हो चुका था और महंत ने अमृतपान कर कमेटी के अधीन सेवा करने की स्वीकृति दे दी थी। लेकिन सरकार द्वारा सिखों पर हो रही सख्ती देखकर महंत ने भी अपना रुख बदल लिया। उसने सोचा कि अब ज़मीन को फिर से अपने कब्ज़े में लिया जा सकता है। 8 अगस्त को पांच सिख गुरु का बाग की उस ज़मीन से, जो समझौते के अनुसार कमेटी के प्रबंध में थी, लकड़ियां लेने गए। किसी ने कोई विरोध नहीं किया और महंत ने भी शिकायत नहीं की। लेकिन बेदी बृज लाल ने पुलिस को सूचना दी, जिस पर 9 अगस्त को पुलिस ने इन पांचों सिखों को गिरफ्तार कर लिया और 10 अगस्त को छह-छह महीने की सज़ा सुना दी। सरकार का यह कदम अन्यायपूर्ण था क्योंकि कमेटी के लोग गुरुद्वारे की अपनी ज़मीन से गुरु के लंगर के लिए लकड़ियां ले रहे थे। इसका कोई ठोस कारण सरकार के पास नहीं था, लेकिन वह जानबूझकर बहाने ढूंढ रही थी ताकि अकालियों को जेल भेजा जा सके। अगर यह गैर-कानूनी था तो कार्रवाई महंत सुंदर दास की रिपोर्ट पर होनी चाहिए थी। सच्चाई यह थी कि अंग्रेज़ी सरकार के अपने नापाक इरादे थे और वह गैर-सरकारी सिखों को दबाने के उपाय कर रही थी। 10 से 22 अगस्त तक पुलिस चुप बैठी रही। फिर ऊपर से आदेश आने पर 22 अगस्त से गिरफ्तारियां शुरू हुईं। 25 अगस्त को अमृतसर के डिप्टी कमिश्नर मिस्टर डंट शिमला से विशेष आदेश लेकर आए और पिटाई का दौर भी शुरू हो गया। 26 अगस्त 1922 को श्रोमणि कमेटी की बैठक कर रहे अंतरंग सदस्य—सरदार मेहताब सिंह (प्रधान), भगत जसवंत सिंह (महामंत्री), प्रो. साहिब सिंह (सहायक सचिव), सरदार सरमुख सिंह झब्बाल (अकाली दल के प्रधान), मास्टर तारा सिंह, बाबा केहर सिंह पट्टी, और सरदार रवल सिंह—गिरफ्तार कर लिए गए। सरकार ने गुरु का बाग में पुलिस बढ़ा दी और नीति बनाई कि जो भी सिख लकड़ियां लेने आए, उसकी लाठियों से पिटाई की जाए। सिखों ने अकाल तख्त के सामने भरपूर दीवान में ऐलान किया कि "गुरु का बाग सिख कौम की संपत्ति है। यदि सरकार ने दखल नहीं छोड़ा तो शांतिपूर्ण सत्याग्रह जारी रहेगा।" सरकार को घमंड था कि मारपीट से यह जोश ठंडा कर दिया जाएगा, लेकिन उसका अनुमान गलत साबित हुआ। 30 अगस्त को लगभग 60 सिखों का जत्था गुरु का बाग की ओर रवाना हुआ। रात होने पर वे रास्ते में ही सो गए, लेकिन पुलिस ने सोते हुए जत्थे को भी पीटा। 31 अगस्त से हर दिन 100 सिखों का जत्था अकाल तख्त से अरदास करके जाने लगा। रास्ते में कड़ी पिटाई होती और सिखों को केसों से पकड़कर पीट-पीटकर बेहोश कर दिया जाता। बाद में कमेटी मोटर कारों से घायलों को अस्पताल ले जाती। उस समय तीन अस्पताल चल रहे थे, जिन पर रोज़ 3,000 रुपये का ख़र्च आता था, लेकिन इतनी सख्ती के बावजूद किसी सिख ने शांतिपूर्ण प्रतिज्ञा नहीं तोड़ी। 2 सितंबर को पंडित मदन मोहन मालवीय जी ने आकर इस अद्वितीय सत्याग्रह को देखा और प्रशंसा की। 3 सितंबर को मुसलमानों ने खैर दीन की मस्जिद में सिखों के लिए दुआ की। 9 सितंबर को पुलिस ने रास्ते की चौकी हटा ली और मारपीट बंद कर दी, और जत्था सीधे गुरु का बाग पहुंचा। डिप्टी सुपरिंटेंडेंट बी.टी. ने खूब पिटाई करवाई, लेकिन सिख "वाहेगुरु" बोलते रहे और कई बार कहा, "और वार करो।" उनकी ऐसी भावना देखकर गैर-सिख भी प्रभावित हुए। मुस्लिम आउटलुक ने 7 सितंबर 1922 को लिखा: "जब तक मारपीट होती रही, नगाड़ा बजता रहा, अकाली ज़मीन पर बैठे रहे, उनकी पीठ, टांगों, टखनों और अन्य हिस्सों पर लाठियां बरसती रहीं। यह मार बहुत ही क्रूर और अमानवीय थी।" डॉक्टर खान चंद देवा ने कहा, "ये अकाली मांस और हड्डियों के नहीं बने थे। इनकी शारीरिक और आध्यात्मिक शक्ति का अंदाज़ा लगाना मुश्किल था।" खिलाफत कमेटी के मिर्ज़ा याकूब बेग ने लिखा, "सिख पंजाब की सबसे सख्त जान कौम है। अगर इतना पिटना किसी और पर पड़ता, तो वे बहुत दुखी होते। मैंने किसी को 'हाय-हाय' करते नहीं देखा।" 12 सितंबर को पादरी सी.एफ. एंड्रयूज़ ने खुद मारपीट देखी और पंजाब के गवर्नर से कहा कि सैकड़ों ईसा मसीह रोज़ सूली पर चढ़ाए जा रहे हैं, जो दुनिया को शांति और साहस का सबक दे रहे हैं। 13 सितंबर को गवर्नर सर एडवर्ड मैकलेगन गुरु का बाग आए। उनके आदेश पर पिटाई बंद हुई और गिरफ्तारियां शुरू हुईं। अब तक लगभग 1,300 गिरफ्तारियां हो चुकी थीं। 10 अक्टूबर से रोज़ाना 100 का जत्था जाने लगा। 25 अक्टूबर को रिसालदार अनूप सिंह जी के नेतृत्व में 100 सेवानिवृत्त फौजी सिख गए। दूर-दूर से हिंदू और मुसलमान मोर्चा देखने आते और सरकार को कोसते। सैयद बुधू शाह के वंशजों ने भी इसमें भाग लिया। 30 अक्टूबर 1922 को, जब कैदियों को अटक जेल ले जाया जा रहा था, पंजा साहिब के सिखों ने दूध-पानी पिलाने का निश्चय किया। स्टेशन मास्टर ने ट्रेन रोकने से मना किया। कई सिख ट्रेन के आगे बैठ गए और कहा, "भले ही हमारा शरीर कुचल जाए, हम अपने भूखे भाइयों की सेवा ज़रूर करेंगे।" इंजन चल पड़ा और दो सिख—भाई प्रताप सिंह और भाई करम सिंह—शहीद हो गए। छह सिख घायल हुए। गुरु का बाग मोर्चा 17 नवंबर को समाप्त हुआ, जब सरकार ने सर गंगा राम को ज़मीन ठेके पर दे दी और पुलिस हटा ली। कुल 5,605 सिख कैद हुए, जिनमें 30 श्रोमणि कमेटी के सदस्य थे। ये वही धार्मिक योद्धा थे जिन्होंने गुरु और गुरुघर की शान के लिए सब कुछ कुर्बान कर दिया। आज के बादल परिवार को इन्हीं जैसा योद्धा मत समझ लेना। — जोरावर सिंह तरसिक्का।
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