श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज ने 19 पोह, संवत 1761 बिक्रम (जनवरी 1705 ई.) को अमृतवेले (प्रातःकाल) रायकोट के घने जंगल में, लेही नदी के किनारे एक टाहली वृक्ष के नीचे आसन लगाकर इस पावन धरती को धन्य किया। दिन चढ़ने पर राय काला का चरवाहा, नूरा माही, मवेशियों के कारण वहाँ आ पहुँचा। गुरु जी ने नूरे को समुद्र-जैसा बड़ा पात्र (गंगा सागर) देकर दूध दुहने का आदेश किया। नूरे ने निवेदन किया, “महाराज, भैंसें तो मैं आज सुबह ही दुहकर आया हूँ। यदि घर से लेकर आऊँ तो दूँ?” गुरु जी ने एक बाँझ बछड़ी की ओर संकेत करते हुए गंगा सागर पकड़ा दिया और कहा कि दूध दो। नूरे ने आदेश मानकर दुहना शुरू किया तो उसकी हैरानी का कोई अंत न रहा जब उस बाँझ बछड़ी ने दूध दिया और 288 छेदों वाले बर्तन (गंगा सागर) से दूध की एक बूँद भी न गिरी। नूरे ने यह सब अपने मालिक राय काला को सुनाया। राय काला उसी समय गुरु जी के चरणों में आ गिरा। उसने विनती की कि महाराज, कोई सेवा बताइए। गुरु जी ने कहा कि हमें सरहिंद से छोटे साहिबजादों और माता जी की खबर मंगवानी है। राय काला ने यह कार्य नूरे को शीघ्रता से करने और लौटने के लिए कहा। माता जी और बच्चों की बहन से दुखभरी कथा सुनकर नूरे ने व्यथित मन से सारी घटना गुरु जी को सुनाई। तब गुरु जी ने वहाँ पर एक काही (झाड़ी) का पौधा उखाड़ते हुए कहा, “आज मुगल साम्राज्य की जड़ हिल गई।” उस समय सारी संगत मौन रही। बाद में गुरु जी का क्रोध शांत होने पर संगत ने निवेदन किया, “महाराज, हम पर दया कीजिए।” तब गुरु जी ने कहा, “ठीक है, तुमने सेवा की है। मलैरकोटला का राज्य कायम रहेगा।” गुरु जी ने राय काला को तलवार, गंगा सागर और रेहल (पुस्तक स्टैंड) बख्शिश करके फरमाया, “जब तक सेवा पूजा करते रहोगे, राज्य कायम रहेगा।” ऐसा ही हुआ — जब तक सेवा होती रही, राज्य कायम रहा। बाद में ‘गंगा सागर’ इनायत ख़ान पाकिस्तान ले गया। गुरु साहिब ने इस स्थान पर 19, 20, 21 पोह को तीन दिन विश्राम किया।
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