गुरु नानक देव जी अपनी उदासियों के दौरान हरिद्वार पहुँचे। वहाँ उन्होंने देखा कि बहुत से लोग गंगा नदी से पानी लेकर सूर्य की ओर फेंक रहे हैं। जब गुरु जी ने कारण पूछा, तो लोगों ने बताया कि यह जल वे अपने पितरों को अर्पित कर रहे हैं, जो स्वर्ग में निवास करते हैं। यह सुनकर गुरु जी ने उसी समय उस कर्मकांड की वास्तविकता उजागर करने का निश्चय किया। वे भी गंगा से पानी लेने लगे, लेकिन पूर्व दिशा की बजाय पश्चिम दिशा की ओर जल फेंकने लगे। लोग आश्चर्यचकित हुए और पूछा – "आप क्या कर रहे हैं?" गुरु जी मुस्कराते हुए बोले – "मैं अपने खेतों को पानी दे रहा हूँ जो पंजाब में हैं। यदि तुम्हारा जल हज़ारों मील दूर स्वर्ग में पितरों तक पहुँच सकता है, तो मेरा पानी पास के पंजाब तक क्यों नहीं पहुँच सकता?" गुरु जी का यह तर्क सुनकर लोग स्तब्ध रह गए। उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ। गुरु जी ने उन्हें समझाया कि सच्ची भक्ति कर्म और सच्चे आचरण में है, न कि निरर्थक कर्मकांडों में। इस साखी की सीख: निरर्थक कर्मकांडों का खंडन तर्क और ज्ञान का महत्व अंधविश्वास से मुक्ति बाहरी दिखावे से अधिक मन की शुद्धता और नेक आचरण का महत्व
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