बाबा राम राए जी का जन्म 1646 में सिखों के सातवें गुरु हर राए जी के घर शीश महल (कीरतपुर) में हुआ था। वे गुरु जी के बड़े पौत्र थे और बचपन से ही योग अभ्यास करते थे। किसी ने औरंगजेब के पास शिकायत की कि सिखों के पवित्र ग्रंथ में मुसलमानों के खिलाफ लिखा गया है, तो औरंगजेब ने गुरु हर राए जी को दिल्ली बुलाया। गुरु जी स्वयं नहीं गए पर उन्होंने बाबा राम राए जी को कहा कि वे उनकी जगह दिल्ली जाएं, तो बाबा राम राए दिल्ली गए और औरंगजेब से मिले। औरंगजेब ने बाबा राम राए से पूछा कि ग्रंथ साहिब में मुसलमानों के खिलाफ क्यों लिखा गया है और उसने राग आसा के नीचे लिखे शब्द की उदाहरण दी: मिट्टी मुसलमान की पैरे पई कुम्हार घड़ी भांडे ईटां किया जल्दी करे पुकार। जल जल होवे बपुडी झक्कर। झूल झक्कर पई अंगार। नानक जिन आपने कारण किया। वही जाने करतार। (श्री गुरु ग्रंथ साहिब पृष्ठ 466) बाबा राम राए ने औरंगजेब से कहा कि मुसलमान शब्द की जगह शब्द बेईमान है। लेखक की भूल से शब्द मुसलमान लिखा गया है। इस पर गुरु पिता ने बाबा राम राए से कहा कि वह उन्हें मुँह नहीं दिखाएं। तो बाबा राम राए पंजाब आने के बजाय उत्तराखंड की ओर चले गए। श्रीनगर (उत्तराखंड) का राजा फतेह शाह उनका साहुकार था। उसने उन्हें देहरादून की जागीर दी। देहरादून उस समय घना जंगल था और शेर-बाघ आम तौर पर घूमते थे। बाबा जी ने 1676 में देहरादून में बसाई। यह कहा जाता है कि जिस स्थान पर बाबा जी के घोड़े ने पैर मारा, वहीं उन्होंने झंडा लगाया। होली के पांचवें दिन (पंचमी) को बाबा जी यहां पहुंचे और उसी दिन उनका जन्मदिन भी है। इसलिए, उस दिन वहां भारी मेला लगता है। बाबा राम राए उच्च स्थर के योगी भी थे। योग की सबसे ऊच्च स्थिति निर्विकल्प समाधि की होती है। इस समाधि में योगी अपने शरीर को त्याग कर बाहर निकल जाता है और कुछ समय बाद अपने शरीर में वापस आ जाता है। एक बार बाबा राम राए ने अपनी पत्नी माता पंजाब कूर को कहा कि वह निर्विकल्प समाधि में जा रहे हैं, कोई उनकी समाधि को तोड़े नहीं। वे अपने कमरे में चले गए और अंदर से कमरा बंद कर के निर्विकल्प समाधि में प्रवेश कर गए। जब वे काफी समय तक अपने शरीर में वापस नहीं आए, तो लोभी मसनदी ने शोर मचा दिया कि उनकी मृत्यु हो गई है। मसनदी की नजर उनकी जमीन और सम्पत्ति पर थी। माता पंजाब कौर ने मसनदी को बहुत समझाया कि वे आगे भी इस तरह की समाधि लेते हैं और कुछ समय बाद उन्होंने अपने शरीर में वापस जा देना है लेकिन मसनदी मानी नहीं। उन्होंने दरवाजा तोड़कर उनके शरीर का अंतिम संस्कार कर दिया। कुछ समय बाद बाबा जी वापस आए और अपने शरीर के अंतिम संस्कार को देखकर चौंक गए। उन्होंने मसनदी को अभिशाप दिया कि जिस तरह तुमने मुझे जीते जी जला दिया है, वैसे ही तुम भी जीते जी जलोगे। यह घटना 1687 में हुई। दसम पिता गुरु गोबिंद सिंह जी वहीं के पौंटा साहिब में निवास कर रहे थे। माता पंजाब कौर ने दसम पिता से फरियाद की। गुरु जी देहरादून गए और मसनदी को जिंदा ही तेल के उबलते कड़ाही में डाल कर जला दिया। वाहेगुरु जी दया करें। 🙏 वाहेगुरु जी दया करें। 🙏
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