4 अक्टूबर 1708 को साहिब-ए-कमाल श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज ने बाबा बंदा सिंह बहादुर जी को पंथ का जथेदार नियुक्त किया। उन्होंने उन्हें थप्पड़ (प्रतीकात्मक अधिकार) देकर पाँच तीर, एक निशान साहिब और एक नगाड़ा भेंट किया, और पाँच सिंहों — भाई बिनोद सिंह जी, भाई कान्ह सिंह जी, भाई बाज सिंह जी, भाई दया सिंह जी और भाई रण सिंह जी — को उनके साथ भेजा। उनका मिशन था — पंजाब में खालसा राज की स्थापना और जालिमों को उनके कर्मों की सज़ा देना। कुछ इतिहासकार इस तिथि को 18 सितंबर 1708 भी मानते हैं। 3 सितंबर 1708 को गुरु गोबिंद सिंह जी, बाबा बंदा सिंह बहादुर जी के मठ में पहुँचे। वहीं बाबा जी ने “बंदा” बनने का प्रण लिया और गुरु जी से खंडे की पहुल प्राप्त की। यह उनकी पहली मुलाकात नहीं थी — वे पहले भी अपने गुरु बाबा समर्थ दास के साथ आनंदपुर साहिब में गुरु जी से मिल चुके थे। गुरु जी की दिव्यता और शख्सियत से माधो दास (बाबा बंदा सिंह का पूर्व नाम) पहले ही प्रभावित थे। गुरु जी ने उन्हें रिद्धि-सिद्धि के कार्य छोड़कर सच्चे “बंदा” बनने का उपदेश दिया। उनकी वीरता और बलिदान के कारण सिख इतिहास में वे “बाबा बंदा सिंह बहादुर” के नाम से प्रसिद्ध हुए। गुरु गोबिंद सिंह जी ने उन्हें अमृत छकाकर “गुरबख्श सिंह” नाम दिया। गुरु जी ने उन्हें नगाड़ा, निशान साहिब और पाँच तीर देकर पंजाब की ओर रवाना किया। उनके साथ पाँच प्यारे और लगभग बीस प्रशिक्षित योद्धा भी भेजे गए — जिन्हें आज की भाषा में “कमांडो” कहा जा सकता है। पंजाब पहुँचते ही बंदा सिंह बहादुर की अगुवाई में सिख एक झंडे के नीचे संगठित होने लगे। 26 नवम्बर 1709 को उन्होंने जालालुद्दीन के गाँव समाणा पर हमला किया — जो गुरु तेग बहादुर जी के जल्लादों में से एक था। यह नगर तबाह कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने सढौरा पर आक्रमण किया, क्योंकि वहाँ के प्रशासक उस्मान खान ने पीर बुध्दू शाह जी को यातनाएँ देकर शहीद किया था। 12 मई 1710 को बंदा सिंह बहादुर ने सरहिंद पर विजय प्राप्त की और छोटे साहिबज़ादों के कातिल नवाब वज़ीर खान को सज़ा दी। सरहिंद को तोपों से उड़ा दिया गया — ईंट से ईंट बजा दी गई। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि गुरु गोबिंद सिंह जी स्वयं भी पंजाब लौटने की तैयारी में थे, परंतु 18 सितंबर 1708 को दो पठानों — जमशेद खान और गुल खान — ने गुरु जी पर हमला कर दिया। कुछ के अनुसार यह हमला 4 अक्टूबर को हुआ। वज़ीर खान ने इन्हें गुरु जी की हत्या के लिए भेजा था। ये दोनों पहले माता सुंदर कौर जी के पास बुरहानपुर पहुँचे और गुरु जी के ठिकाने की जानकारी ली। फिर दक्षिण की ओर चल पड़े। संभवतः इनका गुरु परिवार से कोई पुराना संपर्क था, इसलिए उन्हें आसानी से प्रवेश मिल गया। सिख ग्रंथ श्री गुरु सोभा के अनुसार, ये दोनों कई बार गुरु जी के डेरे में आए और अवसर की तलाश में रहे। एक शाम को उन्होंने अचानक हमला कर दिया। जमशेद खान ने गुरु जी के सीने पर कटार से वार किया, पर जब वह दूसरा वार करने लगा, गुरु जी ने उसकी बाँह पकड़ ली और अपनी कटार से प्रहार किया। वह चिल्लाया “हाय अम्मा!”, तो गुरु जी ने फरमाया — “अम्मा नहीं, अल्लाह कहो, यह अल्लाह कहने का वक्त है।” दूसरे हमलावर गुल खान को सिखों ने पकड़ लिया। गुरु जी ने अपने खून में भीगे वस्त्रों में कहा — “अकाल ने हाथ देकर बचाया है।” लेखक: डॉ. गुरदीप सिंह जगबीर
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