गुरु नानक देव जी के समय से ही सिखी का प्रचार चारों ओर फैल चुका था। भाई गुरदास जी का कथन है कि सिख अस्थान सभी जगत के, ‘नानक आदि मते जे कोआ’ गुरु अंगद देव जी ने टिक के, गुरु अमरदास जी ने मंजीआं अस्थापित करके, गुरु रामदास जी ने विद्वान मसंद भेज के, गुरु अर्जन देव जी ने आपने जाकर सिखी फैलाई। गुरु हरिगोबिंद साहिब जी के वेले सिखी बहुत जोर से फैल रही थी। सिख सैंकड़े बने नवीन दी गवाही सिख इतिहास ने तोर दिया है। फर्ज की पालना, सिखी पर पूरे उतरने की कामना, गुरु के कहे वचनों 'ते बिनां किंतू तक जुरआत दे इस प्रगटावे सिखां में हो रहे थे। एक से एक वध के गुरु के सिख सिखी शान को बढ़ा रहे थे। गुरु के सिख जिस अस्थान 'ते भी बैठे थे गुरु के कहे अनुसार ही करते थे। सेवा टहल में रत भर कसर नहीं रखते। बहुत श्रद्धा से वाहिगुरू का नाम लेते। हर एक के साथ मीठे बचन बोलते! सब कुछ वाहिगुरू का ही दिया मानते। पुत्र, दौलत, घर-बाहर सब कुछ उस वाहिगुरू का समझते। हओमै का अभाव था। ऐसे सिख मिसाल रूप हैं जो आज भी अगवाई कर रहे हैं। जिन्होंने गुरु के कहे वचनों की पालना अपने घर-पुत्र से बढ़कर की, ऐसे गुरसिखों से गुरु भी बलिहारी जाते हैं। गुरु हरिगोबिंद साहिब जी के वेले काबल में सिख धर्म का बहुत प्रचार होता था। इस शहर में कई सिख धर्मशालाएं बनीं थीं। इसी काबल शहर के भाई साध जी रहते थे। भाई साध जी का जिक्र मुहसन फानी ने भी किया है। गुरु जी के हुकम को हमेशा फुल चढ़ने के लिए तत्पर रहते हैं। गुरु जी के हुकम के आगे सिर झुकाए रखें। मुड़िया नहीं, सदा प्रवान चढ़ाया जाता है। भाई साध जी की पत्नी ने भी भाई साध जी के वाला सुभाओ पाया था। साध जी की धरम पत्नी का भी गुरु घर के सा बहुत प्यार था। गुरु ने उनके घर एक सुंदर बेटे की दात दी थी। वह भी अपने माँ-बाप की तरह परोपकारी और सिख धर्म में विश्वास रखने वाला था। असल में पूरा परिवार ही रब से डरने वाला नहीं था, गुरु के साथ अविरल प्यार रखता था। सारे परिवार पर गुरु जी की कृपा थी। हर आने वाले की गुरु का सिखाना बड़ी श्रद्धा से सेवा किया। गुरु की बाणी का पाठ हमेशा किया। चाहे घर में गुरु की दी हुई सब कुछ था पर दौलत का बड़ा हिस्सा आता गया और खर्च करते बोलते कि गुरु की दी हुई दौलत गुरु के सिखों को ही खाया रहे थे। हाथी घर की प्रसाद तैयार करता थी। बेटा और साध जी आते जाते खुश होते थे। घर स्वर्ग था! इतना कुछ था, अहंकार कभी भी नजदीक नहीं आया। हर दिन शाम का दीवान उनके ही घर में होता! दीवान की समाप्ति के बाद संगत को विद्या करा रहे थे कि अचानक एक सिख सेवक घर पूछता आया। गुरु हरिगोविंद जी का सन्देश लेकर आया था। अमृतसर से आकर सबको बड़ी चाह हुई। लोग इसे देख हैरान रह गए कि किस तरह भाई साध जी बिना कुछ पूछे उनकी सेवा में जुट गए। बस इतना उनको जाना इह जो सिख आए हैं गुरु का रूप हैं: मुहसन फानी ने लिखा है कि गुरु का नाम लेकर कोई भी सिख घर के दरवाजे खोल देते थे। उन आए सिखों ने सन्देश दिया तो साध जी आँखें लगाकर कहने लगे: "यह तो हमारे धन भाग हैं कि हमारे जैसे पापी को गुरु जी ने याद किया है। इससे बड़े और क्या कर्म हो सकते हैं? बड़े आदर से उस सिख को बिठाया। बीबी प्यारी पाखा झूलन लग पड़ी। भाई साध जी के सस्ते पैर धुलाए। ऊस पैर के दांत दबाए। खांडान का कटोरा लेकर बड़े आदर से पीने देने का। मिस्टर अहमदि, इतना संवेदनशील, इतना ईमानदार, इतना गुरु के विश्वास में उस गुरु का सेवक अपने पैंडे का कोह भूल गए थे और आंखों में श्रद्धा के आँसू आ गए थे और कहने लगे: "भाईजी, तुमने इतनी सेवा की, इतनी कठिनाई सही, मैं तो गुरु का केवल एक निमाणे सेवक हूँ, गुरु का सन्देश लेकर आया हूँ। तुमने इतनी खातिर की कि एक सेवक को सिर पे बिठाया है! मेरे पास से पहले गुरु का सन्देश लेवो फिर मुझे खाना-पीना देना, यह सब कुछ सुनने भाई साध जी ने कहा: "तुमने यह कैसे जान लिया कि हम तुम्हारी सेवा बहुत कर रहे हैं। तुम तो इस से ज्यादा के हकदार हो। जो सतिगुरु का सिख है, सतिगुरु के निकट होता है, उसके ते वड़े कर्म हैं। चाहे गुरु सबके अंग संग है पर तुम तो उनके पास हो। फिर तुम अपने आप को नीवां कह रहे हो। सिख की सेवा टंग कर्मों के साथ मिलती है। यह सब वाहेगुरु का ही दिया हुआ है। तो इस कारण हमारी सेवा कबूल करो कुछ खा पी लो। उस सेवक ने धन सिखी, धन वाहेगुरू कहकर दूध का कटोरा पिया। सेवक ने बताया कि गुरु हरगोबिंद जी ने इराक से घोड़ा लाने के लिए कहा है। घोड़े की बड़ी परिख थी भाई साध जी को गुरु का हुक्म पा के ही वह इराक की ओर तुरं पिया। जैसे जैसे हुकम की पालना की उसका जिक्र हमारे इतिहास में उच्च स्तर पर किया गया है। ऐसी मिसाल पाना मुश्किल है। उसे पलना किया, घर वालं को सिर्फ जान के बारे फैसला सुनाया। पुत्र को गले से लगाना प्रेम किया। आगे यात्रा लंबी हुई थी। घर से काफी दिन दूर रहना हुआ था। सुख सांत घट ही मिलता था। पर साध जी को कुछ सुझाया नहीं, केवल गुरु का हुक्म सुनाया गया। अब भी वह थोड़ी दूर एक पढ़ाव होगा कि घर वालों के जिक्र से एक आदमी आया कि तेरा पुत्र रुक, दोस्त है बीमार, वापस लौट! तू अभी तक घर से बहुत दूर नहीं है, लड़के की देखभाल कर, यात्रा फिर आरंभ कर लें। यह सुन भाई साध जी ने कहा: "भाई, मैं अब गुरु के हुक्म के अनुसार मुँह करके चल पड़ा हूँ, पुत्र के सिर पर भी अब वाहिगुरु का हाथ है, सभ गुरु अनुसार ही होगा। जितनी उम्र उसकी है उतनी ही भोगनी है। उसका तो जन्म सफल हो ही गया है। उस सिख के घर जन्म लिया है। वह तो गुरु का ही सेवक है। हम भी गुरु के सेवक हैं। उस अनुसार ही कर रहे हैं। उसकी पालना वाहिगुरु ने कैसे करनी है, वही जाने) जो बच गया गुरु दी ही सेवा करनी नूं और अपना जीवन सफला करना सू। अगर वह मर गया तो घर में लकड़ा बहुत हैं, तुम उसका संस्कार कर देना। मैं गुरु की कार निभाने के लिए गुरु के पास मुँह कर चुका हूँ, अब पीछे नहीं मुड़ांगा!" इससे स्पष्ट होता है कि गुरु तो जान वारन वाले ऐसे सिख तैयार हो गए थे। गुरु के हुक्म की पालना करना सिख का पहला कर्तव्य हो गया था। भाई साध जी घोड़े लिए ही घर लौटने गए। भाई साध जी ने अपनी घरवाली को भी सुनाह भेजा, "सिदक न छोड़। अब डोलीं न, यही समय है गुरु का शुक्र अदा करने का। बाणी पढ़ने कुछ भी हमारा नहीं, सब उस वाहिगुरु का है। जिसे बेड़ी इतनी मुश्किल समुंदर में गुरु के नाम द्वारा लिया है पार तो ही लगेगी जो मन्नेंगे। ममता में पै के कहीं डोब न दें। बड़े कष्टां से यह संभाल के रखी है। जन्म तो ही सफल होवेगा ? सचमुच उस माता का सिदक भी देखने वाला था। उसने अपने घरवालों का बचन पाला। अपने जुआन पुत्र की मौत पर रोई नहीं। केवल सतिगुरु का जाप किया। सभी यह सभ देख हैरान रह गए। यह एक अद्भुत कौतक ही था। मां जुआन पुत्र की मौत पर रोई नहीं, केवल स धन्यवाद करें और सतगुरु का नाम लें। जो यह कहें: रज़ा को मीठा मानकर और सतगुरु हमेशा तुम्हारे सहायक हैं, तुम तर गए हो। तुम्हारे जैसे गुरु के सेवक कोई नहीं। भाई साध जी जब घोड़े लेकर मुड़े तो उन्हें पुत्र की मौत का पता लगा। अपने घरवालों को बताया कि तुमने अच्छा संभाला है। मेरी भी लाज रखी है, गुरु ज़रूर ही अपने चरणों में हमें जगह देंगे। भाई साध जी ने उसी समय अरदास की और धन्य मनाया। कोई ऊँचा न बोलो। सिर्फ यह कहो कि तुमने अपनी अमानत संभाली है। जब घोड़ों गुरु जी तक पहुँचे और साथ ही भाई साध जी की करनी की ख़बर पहुँची कि गुरु का बचन तथा सिद्क कायम रखने से, तो गुरु जी ने भी 'निहाल सिख' कहा और उन्हें भाई साध जी के बारे में कहा: "दंपती हमेशा सुखी रहेंगे। दुःख उनके पास नहीं आएगा। उनके सभी चौरासी के गेड़ मिट गए हैं, उन्होंने तथा परतख वाहिगुरु के दर्शन कर लिए हैं। उन्होंने तथा वाहिगुरु के चरणों में अस्थान पा लिया है। वाहिगुरु अंग-संग सहायक है, वाहिगुरु की ओर अभेद हो गए हैं। धन सिखी है और धन ही सिख हैं, और धन ही उनकी कुर्बानी। फ़र्ज़ की पालना तथा गुरु से मार मिटने की चाह की मिसाल शायद ही कहीं मिले।
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