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4 months ago

अमृत ​​वेले का हुक्मनामा - 09 नवंबर 2025

अंग: 653
सलोकु मः ४ ॥ गुरमुखि अंतरि सांति है मनि तनि नामि समाइ ॥ नामो चितवै नामु पड़ै नामि रहै लिव लाइ ॥ नामु पदारथु पाइआ चिंता गई बिलाइ ॥ सतिगुरि मिलिऐ नामु ऊपजै तिसना भुख सभ जाइ ॥ नानक नामे रतिआ नामो पलै पाइ ॥१॥ मः ४ ॥ सतिगुर पुरखि जि मारिआ भ्रमि भ्रमिआ घरु छोडि गइआ ॥ ओसु पिछै वजै फकड़ी मुहु काला आगै भइआ ॥ ओसु अरलु बरलु मुहहु निकलै नित झगू सुटदा मुआ ॥ किआ होवै किसै ही दै कीतै जां धुरि किरतु ओस दा एहो जेहा पइआ ॥ जिथै ओहु जाइ तिथै ओहु झूठा कूड़ु बोले किसै न भावै ॥ वेखहु भाई वडिआई हरि संतहु सुआमी अपुने की जैसा कोई करै तैसा कोई पावै ॥ एहु ब्रहम बीचारु होवै दरि साचै अगो दे जनु नानकु आखि सुणावै ॥२॥ पउड़ी ॥ गुरि सचै बधा थेहु रखवाले गुरि दिते ॥ पूरन होई आस गुर चरणी मन रते ॥ गुरि क्रिपालि बेअंति अवगुण सभि हते ॥ गुरि अपणी किरपा धारि अपणे करि लिते ॥ नानक सद बलिहार जिसु गुर के गुण इते ॥२७॥
अर्थ: अगर मनुष्य सतिगुरू के सनमुख है उसके अंदर ठंड है और वह मन से तन से नाम में लीन रहती है। वह नाम ही सिमरता है, नाम ही पढ़ता है और नाम में ही बिरती जोड़ी रखता है। नाम (रूप) सुंदर वस्तु ख़ोज कर उस की चिंता दूर हो जाती है। अगर गुरू मिल जाए तो नाम (हृदय में) पैदा होता है, तृष्णा दूर हो जाती है (माया की) भूख सारी दूर हो जाती है। हे नानक जी! नाम में रंगे जाने के कारण ही नाम ही (हृदय-रूप) पल्ले में उघड़ जाता है ॥१॥ जो मनुष्य गुरू परमेश्वर की तरफ़ से मरा हुआ है (भावार्थ, जिस को रब वाली तरफ़ से ही नफ़रत है) वह भ्रम में भटकता हुआ अपने टिकाने से भटक जाता है। उस के पीछे लोग फकड़ी वजाते हैं, और आगे (जहाँ जाता है) मुकालख खटता है। उस के मुँहों बहुत बकवास ही निकलती है वह सदा निंदा कर के ही दुखी होता रहता है। किसी के भी किया कुछ नहीं हो सकता (भावार्थ, कोई उस को सुमति नहीं दे सकता), क्योंकि शुरू से (किए मंदे कर्मों के संस्कारों के अनुसार अब भी) इस तरह की (भावार्थ, निंदा की मंदी) कमाई करनी पई है। वह (मनमुख) जहाँ जाता है वहाँ ही झूठा होता है, झूठ बोलता है और किसी को अच्छा नहीं लगता। हे संत जनों! प्यारे मालिक प्रभू की वडियाई देखो, कि जिस तरह की कोई कमाई करता है, उस तरह का उस को फल मिलता है। यह सच्ची विचार सच्ची दरगाह में होती है, दास नानक पहले ही आप को कह कर सुना रहा है (तां जो भला बीज बीज कर भले फल की आस हो सके) ॥२॥ सच्चे सतिगुरू ने (सत्संग-रूप) गांव वसाया है, (उस गांव के लिए सत्संगी) रक्षक भी सतिगुरू ने ही दिए हैं। जिनके मन गुरू के चरणों में जुड़े हैं, उनकी आस पूर्ण हो गई है (भावार्थ, तृष्णा मिट गई है)। दयाल और बेअंत गुरू ने उनके सारे पाप नाश कर दिए हैं। अपनी मेहर कर के सतिगुरू ने उनको अपना बना लिया है। हे नानक जी! मैं सदा उस सतिगुरू से कुर्बान जाता हूँ, जिस में इतने गुण हैं ॥२७॥

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