गुरु जी के पावन शरीर को वहीं क़त्लगाह पर पड़ा रहने दिया गया और उसके चारों तरफ़ कड़ा पहरा लगा दिया गया। आनंदपुर साहिब से एक सिख — भाई जैता जी — दिल्ली आए हुए थे। उन्होंने मन में प्रण किया हुआ था कि गुरु जी का पवित्र शीश आनंदपुर साहिब तक पहुँचाना ही है। रात के समय उन्होंने पहरेदारों की नज़र बचाकर गुरु जी का शीश उठा लिया और उसे चादर में लपेटकर वहां से निकल पड़े। तेज़ी से सफर करते हुए वे आनंदपुर साहिब पहुँच गए। दसवें पातशाह गुरु गोबिंद सिंह जी भाई जैता जी की वीरता और हौसले को देखकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने उन्हें गले से लगाकर शाबाशी दी और वचन किया — “रंगरेटा गुरु का बेटा।” गुरु जी के पवित्र शीश का संस्कार आनंदपुर साहिब में किया गया।
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