28 नवम्बर के दिन भाई मरदाना जी ने अफ़ग़ानिस्तान में ख़ुर्रम नदी के किनारे अपना पंचभौतिक शरीर त्यागकर अकालपुरख के चरणों में जा विराजे। जब भी गुरु नानक साहिब जी के जीवन की चर्चा होती है तो भाई मरदाना जी का उल्लेख न आना असंभव है। सबसे अधिक समय गुरु बाबा नानक के साथ रहने का महान सौभाग्य भाई मरदाना जी को ही प्राप्त हुआ। कई सदियों तक भाई मरदाना जी को भूखा-प्यासा, डरपोक और साधारण मरासी समझा गया, परंतु जब उनके जीवन का अध्ययन किया जाए तो पता चलता है कि वे निष्कपट, शूरवीर, कठिनाइयों से जूझकर मुस्कुराते रहने वाले, राग-विद्या में पारंगत, गुरु के हुक्म के पालनकर्ता, निर्भय और गुरु नानक साहिब जी के ऐसे साथी थे जिन्होंने हर दुख और बाधा से डटकर मुकाबला किया। गुरु नानक के इस प्रिय साथी का ज़िक्र भाई गुरदास जी ने भी अपनी वार में किया है: 👉 “इक बाबा अकाल रूप, दूजा रबाबी मरदाना।” भाई मरदाना जी गुरु नानक साहिब जी से दस वर्ष बड़े थे। भाई कान्ह सिंह जी के महान कोश के अनुसार उनका जन्म तलबंडी में सन 1459 ईस्वी में हुआ। बचपन का पवित्र नाम ‘दाना’ था और ‘मरदाना’ उपाधि उन्हें गुरु नानक साहिब जी से प्राप्त हुई। पिता का नाम भाई बदरे तथा माता का नाम माई लखो था। भाई मरदाना जी को राग-विद्या वंश परंपरा में मिली थी — सुरीली आवाज़ ईश्वर की देन और राग-गायन की समझ पूर्वजों की देन थी। बहुत कम लोग जानते हैं कि विश्वप्रसिद्ध गायक तानसेन के गुरु हरिदास जी, भाई मरदाना जी के शागिर्द थे। उस समय माना जाता था कि मिरासी जन्म से गायक होता है, पर उच्च संगीत और शास्त्रीय कला सीखने के लिए गुरु परंपरा आवश्यक थी। भाई मरदाना जी का विवाह हुआ था और उनके तीन बच्चे थे — दो पुत्र शहज़ादा और रज़ादा, तथा एक पुत्री। गुरु नानक साहिब जी के विवाह पर भाई मरदाना जी ने रबाब वादन से अद्भुत रंग जमाया। उसी समय गुरु साहिब ने उन्हें नई रबाब भेंट की। ‘रबाब’ अरबी शब्द है — यह अरब व ईरान के सूफ़ी फकीरों की समान विरासत है। भाई कान्ह सिंह के अनुसार रबाब का वास्तविक नाम रावण वीणा है। यह मिरासियों का प्राचीन संगीत वाद्य है। रबाब एक तंत्री वाद्य है — दो प्रकार का होता है: 🔹 निबद्ध (तारों पर परदे बंधे) 🔹 अनिबद्ध (परदे नहीं बंधे) इसे बजाने के लिए लकड़ी या हाथीदांत के त्रिकोणीय टुकड़े का उपयोग किया जाता है, जिसे जवा / ज़र्ब / मिज़राब कहा जाता है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब में रबाब का उल्लेख छह स्थानों पर मिलता है। भाई मनी सिंह जी के अनुसार गुरु नानक साहिब और भाई मरदाना जी का पहला मिलन लगभग 1480 में हुआ, तब गुरु नानक साहिब जी की उम्र 11 वर्ष और भाई मरदाना जी की 21 वर्ष थी। पहला मिलन तलबंडी में ही हुआ — दोनों वहीं के निवासी थे। एक साखी के अनुसार — गुरु नानक जी आराम कर रहे थे, तभी रबाब की धुन कान में पड़ी। उन्होंने जाकर पूछा — “भाई, तुम्हारा नाम क्या है?” उत्तर मिला — “नाम दाना है, लोग मरासी कहते हैं।” गुरु साहिब बोले — “तुम रबाब बहुत भली बजाते हो, यदि हमारी संगति में रहकर राग में शब्द जोड़कर गाओगे तो दोनों लोकों का भला होगा।” दाना जी ने चिंता जताई कि परिवार भूखा मर जाएगा। गुरु साहिब ने उत्तर दिया — “सबकी पालना ईश्वर करता है। जब हिसाब होगा तो कोई और उत्तरदायी नहीं होगा। यदि तुम अब ‘मरदाना’ (वीर) बनो और शब्द लगाकर राग गाओ तो तुम्हारा कल्याण निश्चित है।” उस दिन कीर्तन का जन्म हुआ — बाबा नानक का शब्द और मरदाना की रबाब ने ऐसी करामात दिखाई जिसका संसार में कोई सानी नहीं। भाई मरदाना जी पहले श्रोता, पहले वादक और पहले गायक बने जिन्होंने गुरु नानक साहिब जी के मुखारबिंद से निकलती बाणी को सुना और गायन में ढाला। जब गुरु साहिब कहते — “मरदाना, रबाब बजा — बाणी आई है।” वह ज्ञान सृजन का दिव्य क्षण होता था। भाई मरदाना जी राग विद्या के पारंगत कलाकार थे और गुरु साहिब उनकी कला पर अत्यंत प्रसन्न होते। उन्होंने गुरु साहिब से गायक-शैली, राग-बद्ध गायन, बिरहा, पहिरे, थिति, बारा-माह, छंत, सोहिला, अलाहुणियां, कुचजी, सुचजी आदि विशेष शैली की विद्या सीखी। उनकी गाथा अनेक साखियों में वर्णित है — कौड़ा दानव के पास ले जाए जाने, उबलते तेल में डाले जाने और गुरु नानक साहिब के शब्द से तेल के ठंडा हो जाने की साखी प्रसिद्द है। मक्का-मदीना-बगदाद तक रबाब और कीर्तन से चमत्कार हुए, लोगों को सत्य का मार्ग मिला और धर्म की कठोर दीवारें टूट गईं। अंत समय में गुरु साहिब ने पूछा — “मरदाना, तुम्हारा शरीर ब्राह्मण-जैसा जलाएँ, क्षत्रिय-जैसा दफनाएँ, वैश्य-जैसा वायु-अर्पण करें या शूद्र-जैसा दबा दें?” मरदाना जी ने उत्तर दिया — “बाबा, आपकी शिक्षाओं से शरीर का भ्रम नष्ट हो चुका है — आत्मा शरीर की संगिनी मात्र है।” गुरु साहिब ने उन्हें हृदय से लगाकर कहा — “मरदाना, तुम ब्रह्म को पहचान चुके हो।” नीच जाति के एक डूम को अपना जीवनसाथी बनाना जातिवादियों पर प्रहार था। गुरु बाबा ने नीच समझे जाने वालों को ऊँचा उठाया और दाना को मरदाना बनाया। ✨ सिख इतिहास में कीर्तन का प्रारंभ रबाब से हुआ और कालांतर में नगाड़े पर जाकर पूर्ण हुआ।
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