साहिबज़ादा बाबा जोरावर सिंह, सिख इतिहास में चमकते ध्रुव तारे के समान हैं। उनका जन्म 15 माघ (30 नवंबर 1696 ईस्वी) को दसवें पातशाह श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के घर, माता जीतो जी की पवित्र कोख से श्री आनंदपुर साहिब में हुआ। इतिहास के अनुसार जब गुरु साहिब को श्री आनंदपुर साहिब छोड़कर जाना पड़ा, तो सरसा नदी के किनारे उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इसी दौरान पूरा परिवार एक-दूसरे से बिछड़ गया। इसी समय माता सुंदर कौर जी, भाई दया सिंह की सुरक्षा में दिल्ली पहुँच गईं और माता गुजरी कौर जी दोनों साहिबज़ादों — बाबा जोरावर सिंह और बाबा फतेह सिंह — के साथ अपने घरेलू रसोइए गंगू ब्राह्मण के घर पहुंचीं। गंगू उन्हें अपने गाँव साहेड़ी ले आया, लेकिन शीघ्र ही उसकी नीयत बदल गई। इतिहासकारों के अनुसार, माता जी के पास धन और कीमती सामान देखकर वह लालच में पड़ गया। साथ ही गुरु साहिब के परिवार को सरहिंद के सूबे के हवाले करके इनाम और प्रसिद्धि पाने का लालच भी उसके मन में आया। उसने माता गुजरी कौर समेत दोनों साहिबज़ादों को सरहिंद के हाकिमों के हवाले कर दिया। वहाँ उन्हें सरहिंद के ठंडे बुर्ज में कैद कर दिया गया। डराने, धमकाने और ठंडे बुर्ज की कठोर यातनाओं के बाद दोनों साहिबज़ादों को वज़ीर ख़ान — सूबा सरहिंद — की कचहरी में पेश किया गया। वज़ीर ख़ान ने काजियों से सलाह ली और उनसे सज़ा निर्धारित करने को कहा। काजियों ने फैसला सुनाया — 👉 या तो इस्लाम स्वीकार कर लो, या मौत के लिए तैयार हो जाओ। इतिहास के अनुसार जब साहिबज़ादों ने इस्लाम स्वीकार करने से साफ़ मना किया, तो काजियों ने उन्हें दीवार में जिंदा चिनवाने का फैसला सुनाया। सभा में मौजूद मलेरकोटला के नवाब ने विरोध करते हुए कहा — “तुम्हारा विरोध गुरु गोबिंद सिंह से है, इन मासूम बच्चों से नहीं। इन बच्चों को सज़ा देना अन्याय है।” कहा जाता है कि वज़ीर ख़ान नवाब की बात से सहमत हो गया, पर दीवान सुच्चा नंद बोल उठा — “नवाब साहिब, आप भूल रहे हैं कि कांटे के पौधों के काँटे बचपन से ही नुकीले होते हैं, और साँप के बच्चे भी साँप ही होते हैं। अगर दुश्मन के पुत्रों को दया दिखाकर छोड़ दिया गया, तो वह बड़ा होकर विद्रोह करेंगे।” सुच्चा नंद की सलाह पर काजियों ने भी हामी भर दी और अंतिम फ़तवा सुना दिया — 👉 इस्लाम या मौत। साहिबज़ादों ने निडर होकर कहा — “हम श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के पुत्र हैं। हम मौत से नहीं डरते। चाहे तुम अपना पूरा अत्याचार आज़मा लो, पर हम अन्याय और ज़बर के आगे झुकने वाले नहीं। हमें मौत की परवाह नहीं — हमारे लिए धर्म हमारी जान से भी अधिक प्यारा है।” उस समय साहिबज़ादा बाबा जोरावर सिंह जी की आयु मात्र 9 वर्ष थी।
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