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Nitnama Hindi Ai
4 months ago

किला श्री आनंदगढ़ साहिब छड़ना

पोह की बर्फ़ीली और सर्द रातों में दसवें पातशाह साहिब श्री गुरु गोबिंद सिंह जी, उनका संपूर्ण परिवार और हज़ारों सिंहों ने अपनी जान को दांव पर लगाकर एक बेमिसाल इतिहास रचा। दुनिया के इतिहास में ऐसी अद्वितीय और महान शहादतों की दास्तान कहीं नहीं मिलती। बड़े साहिबज़ादे बाबा अजीत सिंह जी और बाबा जुझार सिंह जी, चमोकोर साहिब की जंग में शत्रुओं के दलों का सफ़ाया करते हुए शहीद हो गए। छोटे साहिबज़ादे बाबा जोरावर सिंह जी और बाबा फ़तेह सिंह जी को तत्कालीन मुगल हुकूमत ने दीवार में जीवित चिनवाकर शहीद कर दिया। और माता गुजरी जी ने भी शहादत का जाम पिया। परन्तु गुरु जी ने इसे अकाल पुरख की मिठी रज़ा मानकर स्वीकार किया — और यह पूरी मानवता के लिए बलिदान की मिसाल बन गया। ज़ुल्म और अन्याय के विरुद्ध लड़ी गई जंगों में, चमोकोर साहिब की जंग संसार की सबसे अनोखी और असाधारण जंग मानी जाती है। इस युद्ध की पृष्ठभूमि श्री आनंदपुर साहिब की पावन धरती से शुरू होती है। इसकी शुरुआत 6 और 7 पोह 1704 से हुई — जब पहाड़ी राजाओं और मुगल हुकूमत की साज़िशों को भली-भाँति जानते हुए भी गुरु गोबिंद सिंह जी ने क़िला आनंदगढ़ और श्री आनंदपुर साहिब को सदा के लिए छोड़ने का निर्णय लिया। इतिहास का यह अद्भुत अध्याय है कि माता गुजरी जी और चारों साहिबज़ादों की शहादत से पहले, गुरु गोबिंद सिंह जी 9 वर्ष की आयु में ही अपने पिता श्री गुरु तेग बहादुर जी को तिलक और जनेऊ की रक्षा के लिए दिल्ली भेज चुके थे — जहाँ उन्होंने शहादत प्राप्त की। इस शहादत से गुरु जी को मुगल हुकूमत की कट्टर नीति का पूरा बोध हो गया था। इसके बाद गुरु जी ने 1699 की वैशाखी पर खालसा पंथ की स्थापना की और निडर सिंहों की फ़ौज तैयार की — क्योंकि मुगल सेना के सिपाहियों में वह जोश और बलिदान भावना नहीं थी जो गुरु के सिंहों में थी। यह बात दुश्मनों को भी जल्द समझ आ गई। युद्ध से बचते हुए दुश्मनों ने क़िले श्री आनंदपुर साहिब का घेरा डाल दिया। आने-जाने के सभी रास्ते बंद कर दिए गए। खालसा फ़ौजें अद्भुत वीरता से लड़ती रहीं, लेकिन क़िले में राशन और पानी की भारी कमी हो गई। पशुओं के चारे तक की कमी हो गई, यहाँ तक कि वह नाला जिससे पानी क़िले में आता था, उसे भी मोड़ दिया गया। कई सिंह और घोड़े भूख से शहीद हो गए। सिदक के सिपाहियों की परख हो रही थी। मुगलों की बार-बार की घोषणा के बावजूद कि “जो सिंह खाली हाथ जाना चाहे, उसे जाने दिया जाएगा” — कोई भी सिंह डोला नहीं। लेकिन भूख मनुष्य को कमजोर कर देती है — इस कष्ट से तंग आकर लगभग 40 सिंहों ने बेबसी में आनंदपुर साहिब छोड़ने का निर्णय लिया। गुरु जी के सामने विनती की, “गुरुदेव हम जाना चाहते हैं।” गुरु जी ने कहा — “यदि जाना चाहते हो तो चले जाओ, लेकिन जाने की निशानी लिखकर दे जाओ।” उन सिंहों ने बेदावा लिख दिया और चले गए। लेकिन ज्यों-ज्यों वे आनंदपुर से दूर होते गए — गुरु-विछोड़े की पीड़ा उन्हें काटने लगी। घर पहुँचने तक पश्चाताप और शर्म ने उन्हें पूरी तरह घेर लिया — पर समय बीत चुका था। उधर, दुश्मन का घेरा आठ महीने से अधिक समय तक जारी रहा। क़िले में भोजन और पानी लगभग समाप्त हो गया था। ऐसी हालत में चार सिंह रात को क़िले से बाहर निकलते — दो दुश्मन पर प्रहार करते हुए शहीद हो जाते, और दो जितना सम्भव हो उतना राशन-पानी क़िले में ले आते। उधर दुश्मन राजे और मुगल सेना भी लंबी जंग से थक चुके थे। अंततः एक छल किया गया — गुरु साहिब को बादशाह औरंगज़ेब की क़ुरान की क़सम वाली लिखित चिट्ठी भेजी गई। पहाड़ी राजाओं ने गाय की क़सम वाली चिट्ठियाँ भेजीं। इन सबमें लिखा गया कि यदि गुरु साहिब आनंदपुर छोड़ दें तो उन पर हमला नहीं किया जाएगा। गुरु जी वचनभंग करने वाली चाल को भली भांति समझते थे। गुरु ने हड्डियों से भरी गाड़ी पर रेशमी कपड़ा डालकर क़िले से बाहर भिजवाई, जिससे दुश्मन को लगे कि बहुत क़ीमती सामान है। और जैसे ही दुश्मनों ने वादा भूलकर उस गाड़ी पर हमला किया — गुरु जी ने संगत को दिखाया कि “मुग़ल वचन के कभी पक्के नहीं हो सकते।” फिर भी सिखों के आग्रह पर गुरु साहिब आनंदपुर छोड़ने के लिए सहमत हुए। तैयारियाँ शुरू हुईं। माता गुजरी जी, माता सुंदरी जी और माता साहिब कौर जी रब्बी भरोसे तैयारी में लगी हुई थीं। आनंदपुर की हर धड़कन यादों से जुड़ी थी — यहीं माता सुंदरी जी ने सिखों को हथियार अभ्यास करते देखा था, साहिबज़ादों को हँसते-खेलते देखा था, अजीत सिंह को जवानी की तरफ बढ़ते देखा था, जीवन की हर स्मृति हीरों की तरह दिल में जड़ी हुई थी। इन यादों से बिछुड़ते हुए हृदय काँप रहा था, आँखें भर-भर आती थीं… और फिर 6 और 7 पोह की मध्यरात्रि को गुरु साहिब ने परिवार सहित क़िला खाली किया और कीरतपुर साहिब की ओर रवाना हो गए।

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