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4 months ago

बीबी रंजीत कौर शहीद – जानिए इतिहास

शहीद बीबी रंजीत कौर वह महान सिख देवी समान वीरांगना थीं, जिन्होंने अपना धर्म बचाए रखने के लिए अत्यंत कष्ट सहे, ज़ालिमों को कई बार सबक सिखाया और अपनी बहादुरी, फुर्ती और समझदारी के सहारे कई बार दुश्मनों की पकड़ से बचती रहीं। अन्त में वे पठानों के क़ब्ज़े में आ गईं और उन्हें काबुल ले जाया गया। काबुल के बादशाह के महलों से ही वह उसकी पटरानी हमीदा बेगम को भी अपने साथ निकाल लाई, और अपने मंगेतर दलजीत सिंह के साथ पंजाब की ओर लौटते हुए रास्ते में कई सिपाहियों को मारते हुए स्वयं भी शहीद हो गईं। उनकी शहादत के बाद दलजीत सिंह ने उनके ऊँचे, पवित्र प्रेम को निभाते हुए कभी दूसरा विवाह नहीं किया, बल्कि देश की आज़ादी के लिए लड़ते रहे। बाद में वे महाराजा रणजीत सिंह की सेना में सेवा करते रहे। जब सिख राज ग़द्दारों की साज़िशों से समाप्त हो गया, तो उन्होंने सन्यास ले लिया और हरिद्वार के पास के जंगलों में आकर बस गए। वहीं अकाल पुरख का सिमरन करते हुए लगभग 125 वर्ष की आयु भोगकर लगभग 1911 ई. में प्रभु चरणों में जा मिले। लगभग 1787 ई. के आसपास प्रताप सिंह के घर एक बेटी पैदा हुई। उन्होंने उसका नाम रंजीत कौर रखा। उस समय सिखों की मुसलमान शासकों से देश को आज़ाद कराने की लड़ाइयाँ चल रही थीं, इसलिए पिता ने उसका नाम “रण (युद्ध) को जीतने वाली” रखा। घर में धार्मिक वातावरण था, इस कारण छोटी उम्र में ही इस बालिका ने गुरुमुखी पढ़कर, जपजी साहिब और अन्य पाठ कंठ कर लिए। जिस प्रकार वह अत्यंत सुंदर थी, उसी तरह बहुत मधुर स्वर में गुरबाणी का पाठ करती, सबको मोहित कर लेती। धर्मशाला में संगत की सेवा करती और संगत को मधुर लय में पाठ सुनाकर शांति और ठंडक प्रदान करती। पिता ने उसे शस्त्र विद्या भी सिखाई, विशेष रूप से कटार का प्रयोग। जब वह लगभग दस वर्ष की थी, तो पड़ोस के गाँव के सरदार जगजीत सिंह के तेहरह वर्षीय लड़के दलजीत सिंह के साथ उसकी सगाई (कुरमाई) कर दी गई। उस समय दिल्ली में मराठों ने बादशाह शाह आलम का जीना हराम कर रखा था। मराठे दिल्ली लूट कर मुसलमानों को तंग करते थे। अंततः अमीरों-वज़ीरों ने सलाह कर सिखों की सहायता लेने का निश्चय किया। उन्होंने सरदार बघेल सिंह को बादशाह की मदद के लिए बुलाया। सरदार बघेल सिंह ने मराठों को दिल्ली से खदेड़ने की सहायता देने के बदले बादशाह से यह लिखवा लिया कि सिख गुरुओं की याद में दिल्ली में गुरुद्वारे बनाने की पूरी इजाज़त होगी। उधर सरदार बघेल सिंह ने पंजाब से सिखों को संदेश भेजा कि वे दिल्ली के लिए निकलें। मराठे सिखों से डरकर दिल्ली छोड़ अपने इलाक़ों को भाग गए। परंतु जब मराठों के जाने के बाद सिख दिल्ली पहुँचे तो शासक अपने लिखित वादों से मुकर गए और सिखों से लड़ाई के लिए तैयार हो गए। सिखों को अजमेरी गेट पर रोक लिया गया। वहाँ भीषण संग्राम हुआ, सिखों ने दुश्मनों को पीछे धकेल दिया और दिल्ली की लूट शुरू हो गई। काफी धन-दौलत लेकर सिख मजनूँ का टीला (जहाँ गुरु नानक देव जी और गुरु हरिगोबिंद साहिब जी के पावन चरण पड़े थे) पर आ डेरा डाले। वहाँ कड़ाह प्रसाद तैयार किया और भरपेट छका। जब शाह आलम को पता चला कि उसके अमीरों और वज़ीरों की ग़लती से दिल्ली लुटी है तो उसे बड़ा पछतावा हुआ। उसने अपना वकील भेजकर बड़ी नम्रता से माफ़ी माँगी और सरदार बघेल सिंह से भेंट की। अब सरदार बघेल सिंह हाथी पर सवार, साथ में पाँच सौ घुड़सवार, पूर्ण खालसा वेश-भूषा में, और उनके साथ सिख महिलाएँ (बीबियाँ) भी सजे-धजे जुलूस के रूप में शहर से होकर क़िले में पहुँचीं। बादशाह ने बहुत सम्मान से उनका स्वागत किया। सिंहणियों (सिख स्त्रियाँ) को बेगमों के महल दिखाए गए। इन बीबियों में बीबी रंजीत कौर भी थीं — जिनकी सुंदरता और यौवन ने सारी बेगमों को भी फीका कर दिया। किले के भीतर बैठे शहज़ादे अली गौहर ने भी उसकी एक झलक देख ली। सिख स्त्रियाँ तो लौट आईं, पर अली गौहर के मन में रंजीत कौर को पाने की लालसा घर कर गई। बादशाह ने सरदार बघेल सिंह को वचन के अनुसार दिल्ली में गुरुद्वारे बनाने की इजाज़त दे दी। सरदार बघेल सिंह ने पाँच सौ सिख अपने पास रखे और बाकी को वापस पंजाब भेज दिया। चांदनी चौक में नौवें पातशाह के शहीदी स्थल पर और अंतिम संस्कार वाले स्थान पर मस्जिदों को गिराकर गुरुद्वारा बनाया गया। इसी प्रकार बंगला साहिब (आठवें गुरु जी के अंतिम संस्कार स्थली), वह स्थान जहाँ से गुरु गोबिंद सिंह जी ने तीर चलाकर बहादुर शाह के पलंग के पाये पर मारा, मजनूँ का टीला आदि कई स्थानों पर गुरुद्वारे बनाए गए। इसी समय कोतवाली में बैठकर सरदार बघेल सिंह ने दिल्ली के कई जटिल मुकदमों का न्यायपूर्ण निपटारा किया। हर दुखी व्यक्ति उनकी अदालत में आकर न्याय पाता। दोनों पक्षों को संतुष्ट करके विदा करते। अफसर और बघेल सिंह सप्ताह में एक दिन पूरे शहर का भ्रमण करते, और लोग उनसे बहुत प्रेम करने लगे। इसी बीच रंजीत कौर के पिता, सरदार प्रताप सिंह, तुर्कों से लड़ते हुए शहीद हो गए। अब यह माँ-बेटी सिख जथों के साथ जंगलों में रहने लगीं। एक दिन रंजीत कौर अपनी साथिनों के साथ जंगल में पानी भरने गई, पर उनसे दूर निकल गई और वापस न लौटी। सब, विशेषकर उसकी माँ, बहुत चिंतित होने लगे। रंजीत कौर सेवा-भाव, मधुर वाणी, बुद्धि और सुंदरता की मूरत थी। विद्वान, सुशील और पवित्र गुणों के कारण अपने जथे में उसे देवी-सा मान-सम्मान मिलता था। सभी सिख उसे सच्ची देवी समझते, और उसकी माँ को ऐसी पुत्री मिलने पर भाग्यवान मानते। अन्य सिंहणियाँ भी उस पर रशक करतीं कि काश हमारी भी ऐसी पुत्री होती। कुछ समय बाद सभी सिंहणियाँ टोलियाँ बनाकर उसे दूर-दूर तक तलाश करने निकल पड़ीं। काफी भटकने के बाद एक बूढ़ी महिला ने बताया कि चार सिपाही एक डोली में किसी बेहोश युवती को ले जा रहे थे और साथ एक घुड़सवार भी था। सबको समझ आ गई कि रंजीत कौर को कोई उठा ले गया। उधर, उसके ससुराल वालों को भी यह खबर मिली तो उसका मंगेतर काका दलजीत सिंह, अठारह वर्ष का नवयुवक, बिना घरवालों को बताए रातों-रात शस्त्र धारण कर उसकी खोज में निकल पड़ा। इधर, शहज़ादा अली गौहर ने रंजीत कौर को बंद डोली में महल के तहखानों में कैद कर दिया। उसे भूखा रखकर, उस पर दबाव डालकर अपने साथ निकाह करने के लिए मजबूर करने लगा। उसने रंजीत कौर से कहा, “अब तुम क़ैद में हो, तुम्हें कोई छुड़ा नहीं सकता। भूखी मरने से अच्छा है मेरे साथ निकाह कर लो, मैं तुम्हें मुख बेगम बना दूँगा।” निकाह की बात सुनते ही रंजीत कौर क्रोध से भर उठी। उसने तुरंत अपने कुर्ते के नीचे से कटार निकाली और शहज़ादे पर झपट पड़ी। शहज़ादा फुर्ती से एक ओर हट गया और तलवार से वार किया। रंजीत कौर नीचे झुक गई — तलवार उसके ऊपर से निकल गई — और उसने फुर्ती से कटार उसकी छाती में घोंप दी। शहज़ादा हिम्मती तो था, पर इस वार से ज़ोर की चीख मारकर बेहोश होकर गिर पड़ा। उसकी चीख से तहखाना गूँज उठा। सिपाही दौड़ते हुए आए, उसे उठाकर ऊपर ले गए। वह खून से लथपथ था। शहज़ादे के ज़ख़्मी होने के बाद बादशाह ने रंजीत कौर और शहज़ादे दोनों को दरबार में बुलाया। दोनों के बयान लिए गए। रंजीत कौर ने बताया कि किस तरह उसे ज़बरदस्ती उठा लाया गया और फिर निकाह के लिए मजबूर किया गया। उसने कहा: “सिख स्त्रियाँ अपना धर्म नहीं छोड़ सकतीं, पर मिट सकती हैं। अपनी इज़्ज़त और धर्म की रक्षा के लिए मैंने वार किया है।” बादशाह ने काज़ियों की बात की परवाह न करते हुए रंजीत कौर को सुरक्षित किसी जंगल के पास सिखों के जथों के पास छोड़ आने का हुक्म दिया। अब जब रास्ते में उसे वापस छोड़ा जा रहा था, एक नया मोड़ आया। रंजीत कौर सुलेमान के हाथ लग गई — जो एक मशहूर डाकू था। उसने लाखों रुपए और हथियार जमा कर रखे थे। उसने उसे एक तहखाने में कैद कर दिया। यहाँ एक कुआँ बना हुआ था जिसे “दोज़ख का कुआँ” कहा जाता था। वह यह कुआँ दिखाकर युवतियों को डराता, उनकी इज़्ज़त लूटता और उनकी संपत्ति हड़प लेता। सुलेमान ने रंजीत कौर को उस कुएँ पर ले जाकर कहा: “देख, यह दोज़ख का कुआँ है, इसमें तेरे जैसी कई लड़कियों की लाशें सड़ रही हैं। अगर तू मेरे साथ निकाह के लिए ना मानी तो तेरी इज़्ज़त लूटकर तुझे भी इसी में फेंक दिया जाएगा।” वह इतना कह ही रहा था कि शेरनी रंजीत कौर ने “वाहेगुरु” का जाप करते हुए उसे ज़ोर का धक्का दिया और वह सीधे कुएँ में जा गिरा। इस तरह पापी का हमेशा के लिए ख़ात्मा हो गया। निर्भीक रंजीत कौर ने एक मुसलमान पहरेदार को बाँधकर क़िले का बड़ा दरवाज़ा खटखटाया। सुलेमान के आदमियों ने दरवाज़ा खोला तो रंजीत कौर ने पूरी बात बयान की। वे यह सुनकर बहुत खुश हुए। उन्होंने दलजीत सिंह को भी एक अलग तहखाने से रिहा किया, जहाँ वह कैद था। सबने सुलेमान की चाबियाँ ले लीं, तहखाने में पड़ी संपत्ति और हथियार अपने-अपने घोड़ों पर लाद लिए और घरों की ओर चल पड़े। इसी तरह दलजीत सिंह और रंजीत कौर के हिस्से का धन-दौलत और हथियार भी सुलेमान के घोड़ों पर लादकर वे सिख जथों की डेरियों की ओर निकल पड़े। दो दिन रात को सफर करके और दिन में आराम करते हुए दिल्ली के पास सिखों के पास पहुँच गए। धन-दौलत और हथियारों से लदे हुए, और रंजीत कौर के जीवित वापस आने की खबर से सारे शिविर में खुशी की लहर दौड़ गई। उसकी माँ को बधाइयाँ मिलने लगीं। जब सिखों ने रंजीत कौर से शहज़ादे की गुस्ताखी के बारे में सुना तो बड़ी क्रोधाग्नि से भर गए और क़िले में बादशाह को घेर लिया। बादशाह ने अपने बेटे की करतूत पर लिखित माफी माँगी और साथ ही कड़ाह प्रसाद के लिए पाँच सौ रुपए दिए। इन दिनों रंजीत कौर की माँ शहीदी मिसल के सरदार दयाल सिंह के झंडे के नीचे लंगर आदि की सेवा करने लगी। रंजीत कौर भी माँ की सहायता के साथ-साथ बीबियों को इकठ्ठा कर धर्म पर टिके रहने, सिखी मार्ग पर स्थिर रहने का उपदेश देने लगी। वह समझाती कि: “जो सिख मार्ग पर चलकर गुरु पर भरोसा रखे, उसका बाल भी बाँका नहीं हो सकता। परमात्मा स्वयं रक्षा और सहायता करता है।” उसके मधुर बोल और शिक्षाओं का सभी पर गहरा प्रभाव पड़ा। सब उसे देवी समान मानकर प्यार और सत्कार करने लगे। उधर दलजीत सिंह के माता-पिता को भी ऐसी सुशील और समझदार बहू को जल्दी घर लाने की चिंता हुई। विवाह का दिन निश्चित किया गया, दलजीत सिंह की बारात पहुँची। रात को अच्छी सेवा-सत्कार हुआ। सुबह रंजीत कौर अपनी सहेलियों के साथ जंगल में पानी भरने गई। वहाँ तीन पठान घोड़े पर उसे मिले। एक आगे बढ़कर उसे पकड़ने लगा, तो रंजीत कौर ने फ़ौरन उसके पेट में कटार घोंपकर उसे वहीं ढेर कर दिया। बाकी दो पठानों ने उसे दबोच लिया, मुँह बांध दिया ताकि वह चिल्ला न सके, और घोड़े पर लादकर काबुल के बादशाह के सामने पेश कर दिया। बादशाह ने जब उसकी शक्ल देखी तो उसकी सुंदरता से प्रभावित होकर उसे महलों में रख लिया और अपनी पटरानी की सेविका बना दिया। इस तरह वह लगभग छह महीने वहीं रही। बादशाह मुहिमों पर बाहर रहता, और हमीदा बानो पटरानी उससे बहुत प्रेम करने लगी। रंजीत कौर उसे अपने विचारों और गुरबाणी की रसना से धार्मिक रंग में रंगने लगी। जो दासी बनाकर रखी गई थी, वही अपने उत्तम और मधुर स्वभाव के कारण लगभग पटरानी जैसी इज़्ज़त पाने लगी। वह हर समय सिमरन में लगी रहती। नितनेम के समय हमीदा बानो भी पास बैठ जाती और उसे गुरबाणी का रस आने लगा। रंजीत कौर अपना भोजन स्वयं बनाती थी। लगभग एक वर्ष बाद, जब बादशाह बाहर ही रहता रहा, हमीदा ने भी बड़ी मात्रा में गुरबाणी कंठ कर ली। गुरुओं और सिखों की बहादुरी की साखियाँ सुनकर, उसके मन में भी रंजीत कौर के साथ पंजाब जाने का विचार उत्पन्न हो गया। बादशाह की ग़ैरहाज़िरी में एक रात वह वज़ीर, जिसने पहली बार रंजीत कौर को देखा था और उसकी सुंदरता पर मोहित हो गया था, नशे की हालत में महलों में जा पहुँचा। दासियाँ डर गईं। हमीदा की चीख निकल गई, तो रंजीत कौर ने उसे हिम्मत दी और चुप कराया। फिर शेरनी की तरह वज़ीर के गले को पकड़कर इतनी ज़ोर से घोंटा कि उसकी आँखें बाहर निकल आईं और वह बेहोश होकर ज़मीन पर गिर पड़ा। उसकी जेब से कुछ कीमती कागज़ात गिर पड़े। रंजीत कौर ने उसकी तलवार उठाई और वार करने ही वाली थी कि वह उसके पैरों में गिर पड़ा और कहने लगा, “तू मेरी बेटी समान है, मुझे माफ़ कर दे।” उसने हज़ार रुपए देकर वे ज़रूरी कागज़ात उससे वापस ले लिए। इन्हीं पैसों में से पाँच सौ रुपए के साथ दो दूत सिखों और दलजीत सिंह के पास भेजे, और एक पत्र लिख भेजा कि जितनी जल्दी हो सके, आकर उसे ले जाएं। इस तरह रास्ता बनाते हुए वे दूत पत्र लेकर दलजीत सिंह के पास पहुँचे। इधर दलजीत सिंह ने पत्र पढ़ते ही पूरा शस्त्र-सज्जा धारण की, कुछ धन लिया और घोड़े पर सवार होकर रवाना हो गया। पठानों के इलाकों से गुजरता हुआ पेशावर पहुँचा, पठान जैसा भेष धारण कर लिया, और काबुल जाकर मकसूदां नाम की एक बूढ़ी औरत के घर ठिकाना किया। काफी धन खर्च कर, एक रात उसने एक पहरेदार को शराब पिला कर अपने पक्ष में कर लिया। फिर हमीदा बानो और रंजीत कौर दोनों घोड़ों पर सवार होकर रात के अँधेरे में दलजीत सिंह के साथ निकल पड़ीं। अगली सुबह पूरे शहर में खबर फैल गई कि महलों में से रंजीत और हमीदा ग़ायब हैं, और यह भी मालूम हुआ कि कोई नौजवान पंजाब से आया था जिसने यह काम किया है। उसी वज़ीर ने फौज को हुक्म दे दिया कि हर तरफ उनकी खोज की जाए। जल्दबाज़ी में पंद्रह–बीस सिपाही बिना ठीक से हथियार लिए ही घोड़ों पर निकल पड़े। उन्होंने उन्हें घेर लिया। रंजीत कौर और दलजीत सिंह ने कई पठानों को मौत के घाट उतार दिया। जो बचकर लौटे, उन्होंने बाकी को खबर दी, और फिर सैकड़ों पठान उनके पीछे लग गए। रंजीत कौर ने बहादुरी से लड़ते हुए अनेक पठान मार गिराए। अंततः एक पठान का नेज़ा (भाला) उसकी बगल में आ लगा और वह वहीं शहीद हो गई। दलजीत सिंह बड़ी मुश्किल से पठानों की पकड़ से बच निकला। हमीदा बानो को वे वापस ले गए। इस प्रकार वह शेरनी बीबी रंजीत कौर, जिसने कई बार अपनी बहादुरी और सियाणप (समझदारी) से दुश्मनों की चंगुल से अपने धर्म की लाज बचाई, कई पठानों का सफाया करते हुए शहीद हो गई। दलजीत सिंह ने अपनी पूरी जवानी में उसके प्रति सच्चे प्रेम का प्रमाण देते हुए फिर कभी किसी और लड़की से विवाह नहीं किया। वह देश की गुलामी की जंजीरें काटने के लिए संघर्ष करते हुए महाराजा रणजीत सिंह की फौज में भर्ती हो गया, जहाँ उसने बहुत वीरता दिखाई। जब सिख राज्य समाप्त हो गया, तो उसने सन्यास ले लिया और हरिद्वार के पास डेरा लगा लिया। वहाँ 125 वर्ष की उम्र तक एक संत के रूप में जीवन बिताकर परमात्मा को प्यारा हो गया। – जोरावर सिंह तरसिक्का

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