सिख इतिहास असीम बलिदानों से भरा हुआ है। यह साखी भाई गुलाब सिंह, गाँव अकबरपुर खुडाल, तहसील बरेटा, ज़िला मानसा की है। आपका जन्म स्वर्णकार जाति में हुआ था और आप सोने का काम करते थे। भाई साहिब ने श्री आनंदपुर साहिब में श्री गुरु गोबिंद सिंह जी से खंडे-बाटे की अमृत पाहुल ग्रहण करके सिंह सज्जे और गाँव लौटकर अपने काम के साथ-साथ सिखी का प्रचार करने लगे। गाँव में नबी बख़्श नाम का एक नवाब रहता था जिसे मुगल हुकूमत का घमंड चढ़ा हुआ था। भाई साहिब द्वारा सिखी का प्रचार करना उसे पसंद नहीं था। उसने भाई साहिब के हाथों में हथकड़ियाँ और पैरों में बेड़ियाँ डालकर उन्हें एक गहरे भोरे (गड्ढे) में बंद कर दिया। भाई साहिब उस भोरे में पड़े गुरु साहिब के आगे अरदास करते कि — “हे गुरु साहिब, यदि आपका निर्दोष सिख इस तरह शरीर छोड़ गया, तो सिख धर्म की बेअदबी होगी।” उस समय सर्वज्ञ गुरु साहिब सरसा के रास्ते पश्चिम की ओर जा रहे थे। जब उन्हें यह बात ज्ञात हुई तो वे कुछ सिखों को साथ लेकर 1 नवंबर 1706, शुक्रवार को गाँव अकबरपुर खुडाल पहुँचे। गाँव के बाहर घोड़े बाँधकर वे पैदल ही भोरे वाले स्थान पर पहुँचे। पहरा दे रहे सिपाहियों को बंदी बनाकर गुरु साहिब ने भाई गुलाब सिंह को बाहर आने का निर्देश दिया, पर भाई साहिब बोले — “मैं तो बेड़ियों से बँधा हुआ हूँ।” तब गुरु साहिब ने कहा — “‘ਸਤਿਨਾਮ ਵਾਹਿਗੁਰੂ’ बोलो, बेड़ियाँ अपने आप टूट जाएँगी।” भाई साहिब ने वैसा ही किया और बेड़ियाँ टूट गईं। वे भोरे से बाहर आ गए। गुरु साहिब ने उन्हें अपने सीने से लगाया और कहा — “यह मेरा सिद्की सिख है।” इस प्रकार गुरु जी ने अपने सिख का उद्धार किया। वाहेगुरु जी ❤️🙏 वाहेगुरु जी ❤️🙏
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