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Nitnama Hindi Ai
4 months ago

गुरुद्वारा श्री सुखचैनआणा साहिब पातशाही छैवीं, फगवाड़ा

इस पवित्र स्थान को पातशाही छैवीं श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी के चरणों की छोह प्राप्त है। संवत 1691 (सन् 1634) में मीरी-पीरी के मालिक गुरु हरगोबिंद साहिब जी, करतारपुर की चौथी जंग के बाद पलाही साहिब पहुँचे। वहाँ उनकी मुगल फौजों के साथ झड़प हुई, और मुगल सेना डरकर भाग गई। गुरु साहिब को फ़ग्गू नाम का सेवक याद किया करता था। गुरु साहिब ने कहा कि चलो फ़ग्गू के बाड़े पर जाकर आराम करते हैं। जब गुरु साहिब फ़ग्गू चौधरी के पास पहुँचे, तो उसे पता लगा कि गुरु जी मुगलों से युद्ध करके आ रहे हैं। यह सुनकर वह डर गया और उसने गुरु जी की सेवा नहीं की। गुरु साहिब समझ गए कि वह भयभीत है। तब गुरु साहिब ने स्वाभाविक रूप से कहा — “फ़ग्गू का बाड़ा बाहर से मीठा, अन्दर से खारा।” इसके बाद गुरु साहिब इस स्थान पर आए। यह पूरा क्षेत्र उस समय जंगल हुआ करता था। गुरु साहिब ने यहाँ एक बेरी के नीचे विश्राम किया और ‘सुख-चैन’ प्राप्त किया। इसी स्मृति में आज इस स्थान पर गुरुद्वारा सुखचैनआणा साहिब सुशोभित है। यहाँ हर वर्ष 3 जुलाई को सालाना जोड़ मेला लगता है। गुरु का लंगर 24 घंटे निरंतर चलता रहता है। — अरमिंदर सिंह

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