भाई तारू सिंह जी (1720–1745) एक महान सिख शहीद भाई तारू सिंह अठारहवीं सदी के महान सिख शहीदों में से एक थे। उनका जन्म पंजाब के ज़िला अमृतसर के पूहला गाँव में 1720 में हुआ। जन्म: 1720 (गांव पूहला, अमृतसर) शहादत: 1745 (लाहौर) धर्म: सिख मुग़ल अत्याचार 1716 ईस्वी में बाबा बंदा सिंह बहादुर जी और उनके साथियों की शहादत के बाद, मुगलों ने सिखों पर अत्याचारों की बाढ़ ला दी। सिखों के सिरों की कीमतें तय की गईं। लाहौर का गवर्नर ज़करिया खान इन अत्याचारों में सबसे आगे था। ऐसी हालत में सिखों ने जंगलों में छुप कर रहना शुरू कर दिया ताकि वे इस ज़ालिम हुकूमत का सामना कर सकें। इन्हीं परिस्थितियों में भाई तारू सिंह और उनके परिवार ने लंगर और ज़रूरी सामग्री के माध्यम से सिखों की सेवा की। गिरफ़्तारी भाई तारू सिंह जी की मुखबिरी निरंजनिया रंधावा ने की, जिसे हरिभगत निरंजनिया रंधावा भी कहा जाता है। जैसे ही उसे भाई साहिब की जानकारी मिली, उसने तुरंत ज़करिया खान को सूचना दी। यह बात ज़करिया को सहन नहीं हुई और उसने तुरंत भाई साहिब को गिरफ़्तार करने का आदेश दे दिया। भाई तारू सिंह जी को पकड़कर दरबार में पेश किया गया और उन्हें क्रूरतापूर्वक यातनाएँ दी गईं। उन पर सिखों की सहायता करने का इल्ज़ाम लगाया गया और बहुत जुल्म ढाए गए, लेकिन उन्होंने कभी भी अपने सिखी-सिद्दांत से समझौता नहीं किया। खोपड़ी उतारने का हुक्म ज़करिया खान ने भाई तारू सिंह को अपना धर्म छोड़कर इस्लाम कबूल करने को कहा। जब उन्होंने मना कर दिया, तो ज़करिया ने उनके केस (बाल) काटने का आदेश दिया। भाई साहिब ने कहा: "मैं सिर कटवा सकता हूँ, पर सतिगुरु की दी पवित्र दात (केश) नहीं छोड़ सकता।" इसके बाद ज़करिया ने जल्लाद को आदेश दिया कि भाई साहिब की खोपड़ी रंधी से उतार दी जाए। भाई साहिब को ज़रा भी दुख नहीं हुआ। उन्होंने अपने केस और सांसों के साथ सिखी को निभाया और एक महान मिसाल कायम की। जल्लाद धीरे-धीरे खोपड़ी उतारता रहा और भाई साहिब भाणे को स्वीकारते रहे। पंथ प्रकाश में लिखा है: जिम जिम सिंगन तुरक सतावै। तिम तिम मुख सिंग लाली आवै। शहादत माना जाता है कि खोपड़ी उतरने के बाद भी वे 22 दिन तक जीवित रहे। अंततः 1745 ईस्वी में उन्होंने शहादत पाई। उनकी अद्वितीय शहादत को हम अपनी नित्य अरदास में याद करते हैं। सिख धर्म में शहादत की नींव पांचवें गुरु श्री गुरु अर्जन देव जी ने रखी थी। धर्म, कौम और मानवता की रक्षा हेतु जान न्योछावर करने वाले को सच्चा शहीद कहा जाता है। भाई तारू सिंह जी इसी परंपरा के महान रक्षक थे।
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