Nitnama Nitnama
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3 months ago

संध्या वेले का हुक्मनामा - 09 दिसंबर 2025

अंग: 711
टोडी महला ५ ॥ हरि बिसरत सदा खुआरी ॥ ता कउ धोखा कहा बिआपै जा कउ ओट तुहारी ॥ रहाउ ॥ बिनु सिमरन जो जीवनु बलना सरप जैसे अरजारी ॥ नव खंडन को राजु कमावै अंति चलैगो हारी ॥१॥ गुण निधान गुण तिन ही गाए जा कउ किरपा धारी ॥ सो सुखीआ धंनु उसु जनमा नानक तिसु बलिहारी ॥२॥२॥
अर्थ: हे भाई! परमात्मा (के नाम) को भुलाने से सदा (माया के हाथों मनुष्य की) बे-पत्ती ही होती है। हे प्रभू! जिस मनुष्य​ को तेरा सहारा हो, उस को (माया के किसी भी विकार से) धोखा नहीं हो सकता ॥ रहाउ ॥ हे भाई! परमात्मा का नाम सिमरन करने के बिना जितनी भी जिन्दगी गुजारनी है (वह वैसे ही होती है) जैसे सर्प (अपनी) उम्र गुजा़रता है (उम्र चाहे लम्बी होती है, परन्तु वह सदा अपने अंदर ज्हर पैदा करता रहता है)। (सिमरन से वंचित हुआ मनुष्य अगर) सारी धरती का राज भी करता रहे, तो भी आखिर मनुष्य जीवन की बाजी हार कर ही जाता है ॥१॥ (हे भाई!) गुणों के खजानें हरी के गुण उस मनुष्य​ ने ही गाए हैं जिस पर हरी ने मेहर की है। वह मनुष्य​ सदा सुखी जीवन बतीत करता है, उस की जिन्दगी मुबारिक होती है। हे नानक जी! (कहो-) ऐसे मनुष्य​ से सदके होना चाहिए ॥२॥२॥

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