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Nitnama Hindi Ai
3 months ago

शहीदी दिहाड़ा वड्डे साहिबज़ादे और चमकौर साहिब दे होर शहीद

सिख कौम का इतिहास संसार की सबसे वीर और अद्वितीय कौमों में से एक है। निःसंदेह अन्य कई कौमों ने भी कठिनाइयाँ और बलिदान झेले हैं, लेकिन जिस प्रकार “पुरज़ा-पुरज़ा कटकर शहीद होने” की जीवंत मिसाल सिख इतिहास में मिलती है, वैसी मिसाल पूरे विश्व में कहीं नहीं मिलती। चमकौर की गढ़ी – शहादत का प्याला सरसा नदी के किनारे से बिछड़कर गुरु साहिब बड़े साहिबज़ादों और कुछ सिंहों के साथ चमकौर की कच्ची गढ़ी में पहुँचे। पहाड़ी राजाओं की धोखेबाज़ी और मुग़लों की चालों के बावजूद, सिखी को जीवित रखने के लिए पूरे परिवार को न्योछावर कर देने जैसी मिसाल इतिहास में दुर्लभ है। मुग़ल सेनाओं ने चमकौर की गढ़ी को चारों ओर से घेर लिया। गुरु साहिब के साथ केवल चालीस भूखे-प्यासे, घायल लेकिन अडिग सिंह और दो बड़े साहिबज़ादे थे। जब सिंह शहीद होते गए, तब बड़े साहिबज़ादे बाबा अजीत सिंह जी ने युद्ध में जाने की अनुमति माँगी। उन्होंने इतनी वीरता से युद्ध किया कि लाहौर का सूबेदार ज़बरदस्त ख़ान भी घबरा गया। जब बाबा अजीत सिंह जी शहीद हुए, तब मात्र 11 वर्ष के बाबा जुझार सिंह जी ने भी युद्ध में उतरने की आज्ञा ली और लड़ते-लड़ते वीरगति को प्राप्त हुए। यह वही पवित्र भूमि है जहाँ चालीस सिंह शहीद हुए। सिख धर्म की शहादत परंपरा गुरु नानक देव जी ने अन्याय, पाखंड और अत्याचार के विरुद्ध आवाज़ उठाई। गुरु अर्जन देव जी ने तत्ताती तवी पर बैठकर शहादत दी। गुरु तेग बहादुर जी ने मज़लूमों की रक्षा हेतु शीश दिया। इसी शहादतों की श्रृंखला में गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपना सर्वस्व अर्पित कर एक ऐसा इतिहास रचा जिसकी कोई तुलना नहीं। आनंदपुर साहिब की लंबी घेराबंदी के बाद छलपूर्वक दिए गए वचनों पर भरोसा कर जब गुरु साहिब ने किला छोड़ा, तो शत्रु ने वचन तोड़कर हमला कर दिया। सरसा नदी पार करते समय अनमोल सिख साहित्य, धन और अनेक सिंह बह गए। छोटे साहिबज़ादे और माता गुजरी जी गुरु साहिब से बिछड़ गए। अद्वितीय युद्ध और अमर शहादत चमकौर की गढ़ी में चालीस सिंहों ने लाखों की सेना का सामना किया। गुरु साहिब ने अपने हाथों से साहिबज़ादों को शस्त्र सजाकर युद्ध के लिए विदा किया। अपने पुत्रों की शहादत पर भी गुरु साहिब ने अकाल पुरख का धन्यवाद किया—यह दृश्य संसार के इतिहास में अद्वितीय है। छोटे साहिबज़ादे बाबा ज़ोरावर सिंह और बाबा फ़तेह सिंह जी को सरहिंद में ज़िंदा दीवार में चिनवाया गया, जबकि बड़े साहिबज़ादे चमकौर में शहीद हुए। आज चमकौर साहिब की धरती पूजनीय है। विश्व भर से सिख संगत यहाँ श्रद्धा अर्पित करती है। “शहीदों की क़त्लगाह काबा से कम नहीं, यहाँ की मिट्टी पर ख़ुदा भी क़ुर्बान होता है।”

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