बीबी हरशरण कौर जी की शहादत और देहों का संस्कार गंगू ब्राह्मण की कृतघ्नता के कारण माता गुजरी कौर जी और छोटे साहिबज़ादे (बाबा जोरावर सिंह जी और बाबा फतेह सिंह जी) को मोरिंडा थाने से सरहिंद में वज़ीर ख़ान की हिरासत में भेज दिया गया। आज की रात माता गुजरी कौर जी ने छोटे साहिबज़ादों के साथ सरहिंद की क़ैद में ठंडे बुर्ज में बिताई और ईश्वर की इच्छा को मधुर मानकर स्वीकार किया। जब वज़ीर ख़ान को माता गुजरी जी और छोटे साहिबज़ादों की गिरफ़्तारी की सूचना मिली तो उसने सोचा कि अब वह गुरु साहिब को अपने सामने झुका सकेगा, जो कि उसका बहुत बड़ा भ्रम था। 10 पोह की सुबह माता जी और गुरु के लालों को मोरिंडा की कोतवाली से सरहिंद लाया गया और ठंडे बुर्ज में क़ैद कर दिया गया। वह ठंडा बुर्ज जो गर्मियों में भी ठंडक का एहसास कराता था। माता जी और साहिबज़ादों ने उस रात कड़ी ठंड में बिताई, फिर भी उन्होंने धैर्य और कृतज्ञता का दामन नहीं छोड़ा। यह अत्याचार आज के दिन सरहिंद के सूबे द्वारा माता गुजरी जी और छोटे साहिबज़ादों पर किया गया। बीबी हरशरण कौर जी की शहादत और सिंहों का संस्कार दूसरी ओर, चमकौर साहिब की गढ़ी में घमासान युद्ध के बाद, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी महाराज पाँच सिंहों के आदेश और विनती अनुसार माछीवाड़ा के जंगलों की ओर चले गए और मुग़लों ने इस गढ़ी के चारों ओर अपना डेरा जमा लिया। आस-पास के गाँवों में गुरु साहिब को खोजने का भी आदेश जारी हो चुका था और साथ ही मुग़ल सेनाएँ रात के समय गढ़ी के चारों ओर पहरा दे रही थीं। चमकौर साहिब की लड़ाई और उसमें हुई शहादतों की सूचना मिलने पर, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के चरणों से जुड़ी बीबी हरशरण कौर जी ने अपनी माता जी से अनुमति लेकर चमकौर साहिब में शहीद हुए बड़े साहिबज़ादों और सिंहों के अंतिम संस्कार का निर्णय लिया और रात के अंधेरे में चमकौर की गढ़ी के पास पहुँचीं। उस समय मुग़ल सेनाएँ गढ़ी के चारों ओर पहरा दे रही थीं। गुरु साहिब के सहारे और विश्वास से बीबी हरशरण कौर जी ने शहीद हुए बड़े साहिबज़ादों और सिंहों के पवित्र शरीरों को खोजकर एकत्र किया। उन्होंने चिता तैयार की और बड़े साहिबज़ादों तथा अन्य सिंहों का एक साथ दाह-संस्कार किया, इसके बाद गुरबाणी का पाठ आरंभ किया। जलती हुई चिता को देखकर मुग़ल सेना ने उस दिशा में कूच किया। स्थिति का पता चलने पर उन्होंने बीबी हरशरण कौर जी पर हमला कर दिया। बीबी हरशरण कौर जी ने वीरता से मुकाबला किया, परंतु घायल होकर गिर पड़ीं। इसके बाद मुग़ल सेना ने उन्हें जलती हुई चिता में डालकर जीवित ही अग्नि को समर्पित कर दिया। इस प्रकार बीबी हरशरण कौर जी की यह अद्वितीय शहादत और बलिदान सदा के लिए अमर रहेगी और पूरी दुनिया इस पर गर्व महसूस करेगी।
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