ज़ਫरनामा – गुरु गोबिन्द सिंह जी की फ़ारसी रचना "ज़फ़रनामा" गुरु गोबिंद सिंह जी की एक महान फ़ारसी रचना है। "ज़फ़र" का अर्थ – जीत, विजय, सफलता "नामा" का अर्थ – पत्र, लेख, लिखित ग्रंथ माछीवाड़ा के जंगलों से आगे बढ़कर गुरु गोबिंद सिंह जी "दीना" पहुँचे, जहाँ उन्होंने दिसंबर 1705 में औरंगज़ेब को अपनी विजय और सत्य का संदेश-पत्र "ज़फ़रनामा" लिखकर, भाई दया सिंह और भाई धर्म सिंह के हाथ भेजा। जब औरंगज़ेब की बेटी ने उसे वह पत्र पढ़कर सुनाया — तो शहंशाह पूरी रात सो नहीं पाया। उस रात औरंगज़ेब की मानसिक हालत ऐसी हुई — कभी तूफ़ानी हवाएँ, कभी खिड़कियों-दरवाजों की आवाज़ें, उसका शरीर काँपने लगा, प्यास से बेहाल हो गया, नींद कोसों दूर हो गई। गुरु तेग बहादुर जी की शहादत, छोटे साहिबजादों की शहादत — सब दृश्य उसके सामने जीवंत हो उठे। उसे लगता जैसे सती दास को आग में जलता देख रहा है, भाई मती दास पर आरा चलते हुए देख रहा है… वह रो पड़ा — पर उसके हाथ खाली हवा पकड़ रहे थे। उसने खुद को शीशे में देखा — एक कातिल, अत्याचारी, मज़लूमों का ख़ून-आलोद चेहरा उसे लगा — जैसे दोज़ख (नरक) उसके सामने खुल चुका हो। चमकौर की गढ़ी की लड़ाई उसके सामने घूम गई — “क्या हुआ यदि तूने मेरे चार साहिबज़ादे मार दिए — कुंडली वाला साँप अभी ज़िंदा है” — ज़फ़रनामा की यह पंक्ति उसके अस्तित्व को हिला गई। तीव्र भय ने उसे तोड़ दिया — हाकिम बुलाए गए, मलहम लगाया गया, पर वह रात — उसकी रूह को झकझोर कर चली गई। सुबह होते ही — औरंगज़ेब ने आदेश दिया कि जहाँ भी गुरु गोबिंद सिंह जी हों, उनके रास्ते में कोई बाधा न हो। उसने स्वयं गुरु जी से मिलने का निवेदन किया — परन्तु गुरु जी के मिलने से पहले ही औरंगज़ेब की मृत्यु हो गई। मरते समय उसने कहा — “मैं बड़ा पापी बादशाह हूँ — मेरी कब्र बहुत साधारण बनाई जाए — और पास कोई पेड़ न हो… क्योंकि मेरे जैसा पापी — छाँव का हक़दार भी नहीं।”
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