श्री गुरु हरिकृष्ण साहिब जी के प्रकाश पर्व पर समस्त संगत को लाखों-लाख शुभकामनाएँ। "श्री हरिकृष्ण ध्याइए, जिनके दर्शन से सभी दुख दूर हो जाते हैं।" जब भी कोई सच्चा गुरसिख अकाल पुरख के चरणों में अरदास करता है, वह इन शब्दों का उच्चारण करते हुए अपार प्रेम, श्रद्धा और आदर के साथ गुरु हरिकृष्ण साहिब जी के चरणों में श्रद्धा के फूल अर्पित करता है। अरदास के यह शब्द हमें प्रेरित करते हैं कि गुरु हरिकृष्ण जी के आदर्श जीवन को अवश्य स्मरण करना चाहिए, क्योंकि उनके दर्शन मात्र से संपूर्ण मानवता के सभी प्रकार के दुःख दूर हो जाते हैं। इन विचारों के माध्यम से ‘बाला प्रीतम’ गुरु की महानता, दिव्यता और गरिमा का अनुभव होता है। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से प्रसंग इतिहास की दृष्टि से देखें तो एक ओर श्री गुरु हरिराय साहिब जी का यह आदेश था कि "जो कोई राम राय के माथे लगेगा, वह सिख नहीं", और दूसरी ओर उन्होंने यह भी कहा था कि "जो श्री गुरु हरिकृष्ण जी के दर्शन करेगा, उसके सारे दुख दूर हो जाएंगे।" राम राय ने मुगलों की खुशामद कर अपनी गरिमा खो दी, जबकि श्री गुरु हरिकृष्ण जी ने प्रभु-गुणों का गायन करते हुए उच्चतम आध्यात्मिक पद को प्राप्त किया। राम राय ने दिल्ली जाकर औरंगज़ेब के सामने गुरबाणी की पंक्ति "ਮਿਟੀ ਮੁਸਲਮਾਨ ਕੀ" (मिट्टी मुसलमान की) को बदलकर "ਮਿਟੀ ਬੇਈਮਾਨ ਕੀ" (मिट्टी बेईमान की) कर दिया — यह एक गंभीर अपराध था। गुरु हरिराय जी ने इस पर कहा कि जिसने बाणी का अपमान किया है, वह अब गुरु-घर के योग्य नहीं है। राम राय की असफलता और गुरु हरिकृष्ण जी की दिव्यता जब औरंगज़ेब ने गुरु हरिराय जी को दिल्ली बुलाया, उन्होंने अपनी जगह अपने बड़े पुत्र राम राय को भेजा। गुरु-पिता ने उसे सलाह दी थी कि "दिल्ली जाकर सच्चाई से उत्तर देना और कोई चमत्कार न दिखाना।" (महिमा प्रकाश ग्रंथ में उल्लेख है: "जो पूछे सो सत कहि दीजे, कछु करामात प्रगट नहीं कीजे।") परन्तु राम राय ने पिता के आदेशों को अनदेखा करते हुए 52 से अधिक चमत्कार दिखाए और औरंगज़ेब को प्रसन्न करने हेतु गुरबाणी को बदल डाला। इस कारण, गुरु हरिराय जी ने राम राय को गुरु-घर से सदा के लिए त्याग दिया। इसके विपरीत, श्री गुरु हरिकृष्ण जी ने बचपन में ही अपनी दिव्य सूझबूझ, निर्भयता और विनम्रता से यह सिद्ध कर दिया कि वे ‘गुरु-गद्दी’ के योग्य हैं। उन्होंने "अपना" त्यागकर गुरु-दरबार को समर्पित किया और समाज तथा राजनीति के संदर्भ में भी संतुलन और वीरता का परिचय दिया। 👑 गुरु गद्दी की प्राप्ति गुरु हरिराय जी ने जब देखा कि उनका अंत समय निकट है, उन्होंने अपनी गुरु जोत और मर्यादा के अनुसार अक्तूबर 1661 ई. (कत्तक 1718 बिक्रम) में अपने छोटे पुत्र श्री हरिकृष्ण जी को संगत के समक्ष गुरु बनाया। उन्होंने वरदान दिया: "जो भी श्री गुरु हरिकृष्ण पातशाह के दर्शन करेगा, उसके सभी दुख, दरिद्रता और रोग सहज ही समाप्त हो जाएंगे। सुख और आनंद उसका भाग्य बन जाएगा।" इस प्रकार मात्र सवा पाँच वर्ष की आयु में, गुरु हरिकृष्ण जी "आठवें गुरु" के रूप में प्रकट हुए — और गुरु नानक देव जी की जोत के उत्तराधिकारी बने। 🌼 बाल जीवन और आत्मिक चेतना श्री गुरु हरिकृष्ण जी का प्रकाश (जन्म) श्री गुरु हरिराय साहिब जी के गृह में माता कृष्ण कौर जी की पावन कोख से 2 अगस्त 1656 को कीरतपुर साहिब में हुआ। आपके दादा बाबा गुरदित्ताजी, और परदादा श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी थे। आपके बड़े भाई राम राय थे। गुरु हरिकृष्ण जी को जन्म से ही दिव्य गुण और आध्यात्मिक ऊँचाई प्राप्त थी। आपने बचपन से ही पिताजी की संगत में रहकर उच्च शिक्षा, गुरबाणी, गुरमत सिद्धांतों और अन्य धर्मों का भी ज्ञान प्राप्त किया। आप आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान से ओतप्रोत थे। जो भी विद्वान आपको सुनते या देखते, वे आपके दिव्य गुणों और गूढ़ समझ से चकित हो जाते। आपका हृदय अत्यंत कोमल था और आप परोपकार की भावना को गहराई से समझते थे। 🔥 गुरु जोति का प्रतीक गुरु हरिराय जी को अपने छोटे पुत्र में वही 'गुरु-जोत' दिखाई दी, जो उन्होंने अपने पिता, दादा और परदादा से विरासत में पाई थी। इसीलिए उन्होंने गुरु हरिकृष्ण जी को बहुत छोटी आयु में ही गुरु बनाने का निर्णय लिया। गुरबाणी में आता है: "ਤਖਤਿ ਬਹੈ, ਤਖਤੈ ਕੀ ਲਾਇਕ॥" ("गुरु वही बनता है जो तख्त का हकदार हो।") इसलिए जब गुरु हरिकृष्ण जी गुरु बने, तब उन्होंने यह स्पष्ट किया कि जो उनके दर्शन करेगा, उसके दुख-संताप स्वतः ही मिट जाएंगे। उनका दर्शन — "सभी दुख दूर करने का प्रमाण" बन गया। 💡 गुरु नानक देव जी की अनंत जोत यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि गुरु हरिकृष्ण जी में वही 'अनंत जोत' प्रवेश करती है जो श्री गुरु नानक देव जी से आरंभ हुई थी। यह जोत कभी नष्ट नहीं होती, और यह गुरुओं के माध्यम से विराजमान रहती है — वह उम्र, शरीर या स्थिति से परे होती है। जैसे गुरु अमरदास जी में यह जोत 70 वर्ष की आयु में प्रकट हुई और वे महान समाज सुधारक बने, वैसे ही गुरु हरिकृष्ण जी में यह जोत सवा पाँच वर्ष की उम्र में ही प्रकट हो गई — और वे भी ब्रह्मज्ञानी, निर्भय, तथा अत्यंत सुबुद्ध हुए। 🕊 निर्भीकता और आत्मिक प्रभाव गुरु हरिकृष्ण जी ने बहुत कम आयु में ही यह साबित कर दिया कि वे पूर्ण गुरु हैं। उन्होंने अपने बचपन में ही अहंकार रहित, निर्भय और परोपकारी जीवन जीया। उनका आचरण यह दर्शाता है कि गुरु की जोत उम्र पर निर्भर नहीं करती। वे श्री गुरु नानक देव जी की ही तरह निर्भय और निष्पक्ष बने। जैसे गुरु नानक देव जी ने बाबर को 'जाबर' कहा, वैसे ही गुरु हरिकृष्ण जी ने औरंगज़ेब जैसे शक्तिशाली बादशाह को मिलने से साफ़ इनकार कर दिया।
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