27 जनवरी धन-धन बाबा दीप सिंह जी के जन्म दिवस की सारी संगत को लाख-लाख बधाइयाँ हों। आओ आज संक्षेप में बाबा जी के जीवन पर एक नज़र डालते हैं। बाबा दीप सिंह जी के जन्म स्थान को लेकर कुछ मतभेद हैं। कुछ लोग मानते हैं कि बाबा दीप सिंह जी का जन्म लुधियाना जिले में डहलौं के पास "गुरम" गाँव में हुआ था। इस गाँव में बाबा दीप सिंह जी की याद में एक स्मारक द्वार भी बना हुआ है। यहां बाबा जी के जन्म दिवस पर तीन-दिवसीय दीवान भी सजते हैं। जो गाँव पहूविंड (ज़िला अमृतसर) है, वह बाबा दीप सिंह जी का ननिहाल माना जाता है। परंतु अधिकतर इतिहासकार बाबा दीप सिंह जी का जन्म स्थान भी पहूविंड ही बताते हैं। इतिहास आगे बढ़ाते हैं— एक दिन भाई भगतू जी कुएँ पर काम कर रहे थे, तभी गुरु नानक साहिब जी के घर पर भरोसा रखने वाला, नाम-रस से भरा हुआ एक गुरसिख महापुरुष वहाँ आया। भाई भगतू जी ने बड़े सत्कार से उन्हें बैठाया। इतने में प्रसादा लेकर माता जिउणी जी भी वहाँ पहुँच गईं। भाई भगतू जी ने आदर सहित उस महापुरुष को प्रसाद और पानी छकाया, फिर खुद ग्रहण किया। पास बैठी माता जिउणी जी ने निवेदन किया— “हमारे घर अभी तक कोई संतान नहीं हुई। आप जी गुरु नानक साहिब जी के आगे अरदास कीजिए।” यह सुनकर महापुरुष ने अरदास की और खुश होकर कहा— “आपके घर एक बहादुर, वीर पुत्र पैदा होगा। उसका नाम दीप रखना—जैसे दीपक चारों ओर प्रकाश फैलाता है, वैसे ही वह भी दुनिया में उजाला करेगा।” यह सुनकर माता जिउणी जी और भाई भगतू जी बहुत प्रसन्न हुए। समय आने पर माता जिउणी जी की पवित्र कोख से दो पुत्र पैदा हुए— बड़े पुत्र का नाम रखा गया दीप, और छोटे पुत्र का नाम लाला। बाबा दीप सिंह जी के छोटे भाई लाला सिंह की पीढ़ी आगे चली, जिसका विवरण यह है— भाई लाला जी के पुत्र का नाम था भाई करम सिंह, करम सिंह के पुत्र सरदार गुलाब सिंह, जो महाराजा रणजीत सिंह जी की फौज में जर्नैल थे। गुलाब सिंह के पुत्र सरदार आला सिंह, जो अंग्रेजी फौज में कर्नल रहे। आला सिंह के पुत्र किशन सिंह, और उनके पुत्र गुरबख्श सिंह (पत्नी वसाऊ की वंशावली)। आज उनकी संतानें सरदार गुरदियाल सिंह, गुरदातार सिंह और गुरसहिंदरपाल सिंह हैं। बाबा दीप सिंह जी बचपन से ही अत्यंत मजबूत शरीर के, सुंदर रूप वाले, और हमेशा नाम-सिमरन में लीन रहते थे। उनका परिवार अक्सर श्री आनंदपुर साहिब जाकर गुरु गोबिंद सिंह साहिब जी के दर्शन किया करता था। जब बाबा दीप सिंह जवान हुए, गुरु गोबिंद सिंह जी ने परिवार से कहा— “इस बालक दीप को हमारे पास छोड़ जाओ।” परिवार ने प्रसन्नता से दीप को गुरु चरणों में अर्पित कर दिया। गुरु साहिब ने बाबा दीप सिंह जी को अमृत की दात बख्शी और उन्हें सੰਗतों के जूठे बर्तन मांजने की सेवा पर लगा दिया। जैसे-जैसे बाबा जी बर्तन साफ करते, वैसे-वैसे उनका अंतरमन भी निर्मल होता जाता। एक दिन बाबा जी एक सरबलोह के बर्तन को बहुत ध्यान से साफ कर रहे थे और उसमें बार-बार अपना चेहरा देख रहे थे। गुरु गोबिंद सिंह जी काफी देर से यह देख रहे थे। उन्होंने कहा— “दीप सिंह, यह क्या कर रहे हो?” बाबा जी ने विनम्रता से सिर झुकाया और बोले— “गुरु जी, मैं इस बर्तन को इतना साफ करता हूँ, पर जब इसमें देखता हूँ, तो मुझे अपना चेहरा दिखता है। मैं इसे इतना पवित्र कर देना चाहता हूँ कि इसमें आपका ही दर्शन हो।” गुरु जी उनकी भावनाएँ समझ गए और उन्हें गले लगाकर कहा— “तेरी सेवा स्वीकार हो गई। अब युद्धक विद्या और शिक्षा का अभ्यास करो।” कुछ समय बाद गुरु साहिब ने उन्हें तैयर देखकर पहूविंड (अमृतसर) भेजा और कहा— “यहाँ रहकर सिखी का प्रसार करो। जब समय आएगा, हम तुम्हें बुलाएँगे।” बाद में गुरु जी दमदमा साहिब पहुँचे और वहीं गुरु ग्रंथ साहिब जी का स्वरूप भाई मनी सिंह जी और बाबा दीप सिंह जी से लिखवाया। बाबा जी को दमदमा साहिब की सेवा सौंपकर गुरु जी नांदेड साहिब की ओर चले गए। बाबा दीप सिंह जी ने अपने हाथों से चार श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के स्वरूप लिखे और अनेकों गुटके-पोथियाँ तैयार करके संगतों में वितरित कीं। छोटे साहिबजादों का बदला मुग़लों से लेने में, बाबा बन्दा सिंह बहादुर के साथ, बाबा दीप सिंह जी ने अद्भुत बहादुरी दिखाई। सिख फौज ने उन्हें जिन्दा शहीद का उपाधि दी। जब हरिमंदर साहिब की बेअदबी की खबर मिली, बाबा जी ने खण्डा उठाया और कहा— “माथा कट जावे, पर श्री हरिमंदर साहिब की ओर कदम रुकने ना पाए।” रास्ते में सिर धड़ से अलग हो जाने के बाद भी, बाबा जी श्री हरिमंदर साहिब की ओर लड़ते रहे। अंततः उन्होंने दुर्रानी आक्रमणकारियों से हरिमंदर साहिब को मुक्त करवाया और अमर शहादत प्राप्त की। आज उस महापुरुष, महाबली, महान विद्वान, अमर शहीद बाबा दीप सिंह जी के जन्म दिवस पर सारी संगत को लाख-लाख बधाइयाँ।
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