वड़ा घल्लूघारा 27 माघ, 1762 ई. को अहमद शाह अब्दाली के छठे आक्रमण के दौरान घटित हुआ। अब्दाली ने भारत पर कुल 11 आक्रमण किए थे। अंततः सिखों के हाथों मिली अपमानजनक पराजयों के बाद ही उसने आक्रमण करना बंद किया। 1761 में अपने पाँचवें आक्रमण के दौरान मराठों को हराने के बाद, अब्दाली लगभग 25–26 हज़ार मराठा और हिंदू महिलाओं व बच्चों को बंदी बनाकर काबुल की ओर चल पड़ा। पंजाब में प्रवेश करते ही, हमेशा की तरह सिख उसके पीछे लग गए। सिखों ने लाखों रुपये का माल-असबाब लूट लिया और हज़ारों हिंदू लड़कियों व लड़कों को अब्दाली की कैद से छुड़ाकर उनके घरों तक पहुँचाया। अब्दाली भारत में मुग़लों और मराठों की शक्ति तोड़ चुका था। अब केवल सिख ही उसके सामने खड़े थे। जैसे ही अब्दाली काबुल पहुँचा, सिखों ने विभिन्न स्थानों पर कब्ज़ा कर लिया। अक्टूबर 1761 में सिखों ने गुरमता करके नवाब कपूर सिंह के नेतृत्व में लाहौर के शासक उबैद ख़ान को पराजित कर लाहौर पर कब्ज़ा कर लिया। नवाब कपूर सिंह ने सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया को सिंहासन पर बैठाकर उन्हें “सुल्तान-उल-क़ौम” की उपाधि प्रदान की। सिख जानते थे कि उस समय उनके पास लाहौर पर स्थायी रूप से कब्ज़ा बनाए रखने की शक्ति नहीं है। इसलिए उन्होंने लाहौर छोड़कर जंडियाला सरकारी में चुगलखोर महंत आकिल दास निरंजनीय को घेर लिया, जिसने भाई तरू सिंह और महिताब सिंह मीरांकोटिया जैसे कई योद्धाओं को चुगली करके मरवा दिया था। महंत ने अपने दूत अब्दाली के पास भेज दिए। अब्दाली पहले से ही पंजाब की ओर बढ़ चुका था। सिखों को भी उसके आने की सूचना मिल गई। उन्होंने अपने परिवारों को मालवा के रेतीले इलाकों की ओर भेजा ताकि वे निश्चिंत होकर अब्दाली का सामना कर सकें। जब अब्दाली लाहौर पहुँचा, तब सिख सतलुज पार कर मालेरकोटला के पास गाँव कुप के निकट डेरा डाले हुए थे। उस समय सिखों की सेना लगभग 50 हज़ार थी और लगभग 50–60 हज़ार महिलाएँ, बच्चे और वृद्ध साथ थे। मालेरकोटला के नवाब भीखन शाह और सरहिंद के सूबेदार ज़ैन ख़ान ने, अब्दाली के आदेश पर, सिखों को घेर रखा था। 27 माघ, 1762 को सूर्योदय से पहले ही अब्दाली ने दल ख़ालसा पर भीषण हमला कर दिया। उसने अपनी सेना को दो भागों में बाँट दिया—एक अपने पास रखी और दूसरी अपने वज़ीर शाह वली ख़ान को ज़ैन ख़ान, भीखन ख़ान और दीवान लक्ष्मी नारायण के साथ सिखों के काफ़िले पर हमला करने भेजा। सिखों ने अपने काफ़िले को चारों ओर से घेरकर डटकर मुकाबला किया। इस युद्ध में लगभग सभी मिसलों के सरदार, सरदार जस्सा सिंह आहलूवालिया के नेतृत्व में शामिल थे। शाह वली ख़ान ने काफ़िले को भारी नुकसान पहुँचाया—हज़ारों वृद्ध, महिलाएँ और बच्चे मारे गए तथा हज़ारों को बंदी बना लिया गया। सूचना मिलते ही सरदार जस्सा सिंह ने सरदार शाम सिंह, सरदार करोड़ा सिंह, सरदार नाहर सिंह और सरदार करम सिंह को सहायता के लिए भेजा। सिखों ने बंदियों को छुड़ाया और शाह वली की सेना को भारी क्षति पहुँचाई। सरदार चढ़त सिंह के हाथों जनरल सर बुलंद ख़ान और सरदार जस्सा सिंह के हाथों प्रधान सेनापति जहान ख़ान घायल हुआ। इस घल्लूघारे में सिख सेना लगभग 50,000 थी जबकि अब्दाली की सेना लगभग 2 लाख थी। सिखों के 16–18 हज़ार महिलाएँ व बच्चे और 10–12 हज़ार सिख योद्धा—कुल मिलाकर लगभग 25–30 हज़ार—शहीद हुए। अब्दाली की सेना के भी 10–12 हज़ार सैनिक मारे गए। सिखों का सारा सामान लूट लिया गया। अब्दाली की सेना के साथ पंजाब के सभी फ़ौजदार और चौधरी भी थे। अब्दाली ने सिखों का पीछा बरनाला तक किया और सिखों की बिखरी लाशों को इकट्ठा कर 60 गाड़ियों में भरकर लाहौर के दरवाज़ों के मीनारों पर टंगवा दिया। यह युद्ध सिखों की वीरता के कारण स्मरणीय है। अमृतसर और दमदमा साहिब की प्राचीन बीड़ें भी अब्दाली ने नष्ट कर दी थीं। इस घल्लूघारे में शहीद हुए सिखों की स्मृति में कुप-रहीड़े में एक स्मारक स्थापित है। यह सिख इतिहास का एक गौरवमयी अध्याय है और इसे वड़ा घल्लूघारा के नाम से याद किया जाता है।
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