सिख इतिहास में जैतो मोर्चे का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। यदि यह कहा जाए कि जैतो मोर्चे ने देश की आज़ादी की नींव रखी, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। फरीदकोट ज़िले के जैतो में स्थित गुरुद्वारा शहीद गंज टिब्बी साहिब में वार्षिक जोड़ मेला चल रहा है। इस जोड़ मेले और जैतो मोर्चे के इतिहास को जानने के लिए हमारी टीम गुरुद्वारा शहीद गंज टिब्बी साहिब पहुँची। आइए जानते हैं कि जैतो मोर्चा क्या था, क्यों लगाया गया और किसके द्वारा लगाया गया। इतिहास ईटीवी भारत के पत्रकार से बातचीत करते हुए सिख नेता बीबी राजिंदर कौर ने बताया कि जैतो मोर्चा अंग्रेज़ी हुकूमत की ज़्यादतियों के खिलाफ सिख संगत द्वारा लगाया गया था। उन्होंने बताया कि महाराजा पटियाला और महाराजा नाभा के बीच चल रहे विवाद को समाप्त करने के बहाने अंग्रेज़ों ने महाराजा नाभा रिपुदमन सिंह से सभी अधिकार छीन लिए और उन्हें गद्दी से उतार दिया। इसके विरोध में सिख संगत ने महाराजा रिपुदमन सिंह के समर्थन में प्रस्ताव पारित किए। अंग्रेज़ों द्वारा श्री अखंड पाठ साहिब का भंग किया जाना बीबी राजिंदर कौर ने बताया कि जैतो नाभा रियासत का हिस्सा होने के कारण गुरुद्वारा टिब्बी साहिब में महाराजा रिपुदमन सिंह की चढ़दी कला (कल्याण) के लिए श्री अखंड पाठ साहिब आरंभ किए गए। अंग्रेज़ हुकूमत ने बलपूर्वक इन अखंड पाठों को भंग कर दिया और श्री गुरु ग्रंथ साहिब की ताबिया में बैठे ग्रंथी सिंहों को खींचकर हटा दिया। इससे सिख संगत में भारी रोष फैल गया। इसके बाद शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने पुनः गुरुद्वारा टिब्बी साहिब में श्री अखंड पाठ साहिब के प्रकाश हेतु 25-25 सिंहों के जत्थे भेजने शुरू किए, जिन्हें अंग्रेज़ सरकार रास्ते में ही गिरफ़्तार कर जेलों में डाल देती थी। इस प्रकार हुईं शहादतें बीबी राजिंदर कौर ने बताया कि अंततः शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी द्वारा बरगाड़ी से 500 सिंहों का एक शहीदी जत्था गुरुद्वारा टिब्बी साहिब की ओर भेजा गया। रास्ते में स्वयं संगत इस जत्थे में शामिल होती गई और यह जत्था एक विशाल जुलूस का रूप लेकर गुरुद्वारा टिब्बी साहिब के निकट पहुँचा। यहाँ अंग्रेज़ी हुकूमत के सैनिकों ने सिख संगत पर गोलियाँ चला दीं, जिसमें बड़ी संख्या में सिंह शहीद हो गए। सिख बीबी बलवीर कौर का योगदान बीबी राजिंदर कौर ने बताया कि इस शहीदी जत्थे के साथ एक सिख बीबी, जिनका नाम बलवीर कौर था, भी चल रही थीं। उनके एक हाथ में श्री निशान साहिब था और दूसरे हाथ में उन्होंने अपने बच्चे को उठाया हुआ था। जब गोलियाँ चलीं तो उनके बच्चे को भी गोली लग गई। उस समय बीबी बलवीर कौर ने सिख कौम की चढ़दी कला के प्रतीक निशान साहिब को झुकने नहीं दिया और अपने घायल बच्चे को ज़मीन पर लिटा दिया। उनकी स्मृति में यहाँ विशेष रूप से एक छोटा निशान साहिब स्थापित किया गया है। गुरुद्वारा टिब्बी साहिब का इतिहास सन् 1762 विक्रमी में बैसाख महीने के दौरान श्री गुरु गोबिंद सिंह जी कोटकपूरा से चलकर बैसाख के दिन सोमवार को जैतो की सीमा में पहुँचे। 19 बैसाख 1705, मंगलवार को चंद्रग्रहण की पूर्णिमा का पर्व जैतो में मनाया गया। गुरु साहिब ने गाँव जैतो के बाहर एक ऊँची टिब्बी पर डेरा लगाया और सिंहों को तीरंदाज़ी का अभ्यास करवाया। शाम को रहिरास साहिब का पाठ किया गया और दीवान सजाए गए। दीवान की समाप्ति के बाद गुरु गोबिंद सिंह जी जैतो की बस्ती के पास स्थित गंगसर साहिब स्थान पर विश्राम के लिए गए। उस समय मालवा क्षेत्र में पानी की भारी कमी थी और टिब्बी साहिब के पास पानी उपलब्ध नहीं था। गुरु साहिब गंगसर साहिब पहुँचे। भाई राम सिंह की प्रेरणा से भाई सेर सिंह, भाई प्रताप सिंह और भाई संत सिंह आदि ने टिब्बी साहिब में कुआँ खुदवाया। पक्की मंज़ी साहिब और लोहे का निशान साहिब भी तैयार करवाया गया। बाद में नाभा रियासत ने केवल आठ घुमाव ज़मीन गुरुद्वारा साहिब के नाम की। आज इसी स्थान पर गुरुद्वारा टिब्बी साहिब सुशोभित है। हर वर्ष मनाया जाता है शहीदी दिवस इस अवसर पर गुरुद्वारा साहिब के ग्रंथी सिंह भाई गुरप्रीत सिंह ने बताया कि हर वर्ष 13 फरवरी से 101 श्री अखंड पाठ साहिबों की श्रृंखला आरंभ होती है। 19 फरवरी को नगर कीर्तन सजाया जाता है और 21 फरवरी को शहीदी दिवस मनाया जाता है। यह संपूर्ण आयोजन शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी और सिख संगत के सहयोग से हर वर्ष किया जाता है।
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